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नई दिल्ली। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आर्थिक रूप से पिछड़ों को 10 फीसदी आरक्षण देने को मंजूरी दी है। अब सरकार संविधान संशोधन प्रस्ताव के साथ संसद में विधेयक लाएगी। जाति आधारित आरक्षण का विरोध करने वाले आर्थिक आधार पर इसकी पैरवी करते रहे हैं। लेकिन आरक्षण के प्रावधानों को हमेशा कोर्ट में चुनौती दी जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देने वाला नया कानून कोर्ट की कसौटी पर कैसे खरा उतरेगा? पिछड़ेपन की आर्थिक व्याख्या कानून की परिभाषा में कैसे समायोजित होगी।

कानून के जानकारों की मानें तो आर्थिक कमजोरी भी पिछड़ापन हो सकती है। सरकार को कानून बनाने का अधिकार है और संसद से कानून पारित हो गया तो कोर्ट के लिए उसे खारिज करना आसान नहीं होगा।


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