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नई दिल्ली: 2018 अपने अंतिम पड़ाव पर है। ये साल खट्टी मीठी यादों के साथ अपने हर एक दिन को इतिहास के पन्नों में दर्ज करा चुका है। देश और दुनिया में  तमाम घटनाओं ने हर किसी का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया। इनमे से एक है कि भारत और चीन के बीच का संबंध। आम तौर पर ये माना जाता है कि दुनिया के दो शक्तिशाली देश कभी मित्र नहीं हो सकते हैं। अगर चीन के संदर्भ में देखा जाए तो ये गलत न होगा। लेकिन कहा जाता है कि आप किसी उभरती शक्ति को नजरंदाज भी नहीं कर सकते हैं। भारत के संदर्भ में चीन के लिए ये बात 100 फीसद खरा उतरती है।

2017 में 60 बिलियन डॉलर वाले सीपेक पर चीन और भारत के बीच तनातनी को पूरी दुनिया ने देखा। भारत का तब और आज भी स्पष्ट मत है कि चीन-पाक आर्थिक गलियारा भारत की संप्रभुता के लिए खतरा है और उसे वो स्वीकार नहीं कर सकता है। इसके ठीक पहले 73 दिनों तक चलने वाले डोकलाम विवाद को कौन भूल सकता है। डोकलाम के संबंध में भारत के संयम भरे कूटनीतिक और राजनीतिक कदम से चीन को झुकना पड़ा और चीन, भारत, भूटान ट्राइजंक्शन पर चले विवाद में भारत को अहम कामयाबी मिली। 


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