इतिहास बन गई गायखुरी की रंगोली

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भारतवर्ष के सबसे बड़े त्यौहार दीपावली के करीब आते ही एक बार फिर बाजारों में रंगोली की रौनक दिखाई देने लगी। जो दीपावली के 5 दिनी पर्व के दौरान घरों के आंगन में उकेरी जाएंगे। इस रंगोली के पीछे एक कहानी आज हम आपको बताने जा रहे हैं जिसे सुनकर शायद बहुत से लोगों के जहन में यह बात स्वतः ही उतर जाए कि हां जिला मुख्यालय स्थित गायखुरी की रंगोली एक समय पहले बहुत अधिक प्रसिद्ध हुआ करती थी। मगर यह रंगोली समय के साथ कहां लुप्त हो गई पता ही नहीं चला।

शहर के वार्ड नंबर 33 गायखुरी घाट के पत्थरों से बनाई जाने वाली रंगोली अब इतिहास की बात बनती जा रही है। स्थानीय जन बताते हैं कि 15 वर्ष पहले तक गायखुरी घाट में मिलने वाले पत्थरों की पिसाई कर रंगोली बनाई जाती थी। जो समय के साथ बनाए जाना बंद कर दी गई। रंगोली बनाने से स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलता था और दीपावली का खर्चा भी निकल आता था। लेकिन समय के साथ-साथ अब यह काम बंद हो चुका है।

वक्त के साथ-साथ गायखुरी की रंगोली जरूर बाजार से लुप्त हो गई लेकिन कॉस्मेटिक और केमिकल के इस दौर में आज भी लोग उस प्राकृतिक रंगोली को याद करते हैं कैसे गायखुरी की रंगोली स्वास्थ्य के लिए बिना हानिकारक नही थी।

स्थानीय उत्कृष्ट स्कूल मैदान में सजे रंगोली के बाजार में स्थित रंगोली विक्रेताओं से जब हमने चर्चा की और जाना कि वर्तमान समय में कहां की रंगोली आ रही है तो उन्होंने बताया की सिवनी जिले की रंगोली आसानी से बाजार में पहुंच रही है।

निश्चित दीपावली के दौरान रंगोली क्यों डाली जाती है और उसका क्या महत्व होता है इस विषय पर जब हमने ज्योतिषाचार्य से चर्चा की तो उन्होंने रंगोली के महत्व को कुछ इस तरह से हमें बताया।

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