राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा वर्ष 1995 की तर्ज पर एक बार फिर नगर पालिका नगर पंचायत में पार्षद दल के नेता को अध्यक्ष बनाए जाने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। जिससे इस बार फिर पार्षद का चुनाव बहुत अधिक दिन तक होने की उम्मीद जताई जा रही है।
बात यहां हम नगर पालिका परिषद बालाघाट की कर रहे हैं दरअसल ब्रिटिश शासन काल बालाघाट नगर पालिका का गठन हो चुका है इस दौरान 1904 से लेकर 1995 तक मनोनीत सदस्य फिर प्रशासक द्वारा नगरपालिका की कमान संभाली गई है।
वर्ष 2000 में अनुभा मुंजारे पहली बार जनता द्वारा निर्वाचित अध्यक्ष बालाघाट नगर पालिका तक पहुंची उसके बाद से लेकर अब तक 22 साल के कार्यकाल के दौरान 20 साल में चार बार अनुभा मुंजारे लगभग 10 वर्ष तक नगर पालिका अध्यक्ष नहीं इस बीच में असंतोष प्रशासनिक कार्यवाही के चलते उषा चौरसिया और वंदना बारमाटे ने कुछ समय के लिए नगर पालिका की बागडोर संभाली थी।
इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता रमेश रंगलानी और अनिल द्वारे भी एक एक बार अध्यक्ष पद पर आसीन रह चुके हैं।
कोरोना संक्रमण काल और अन्य दूसरी वजह से 2 वर्ष से एक बार फिर नगरपालिका प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा संचालित की जा रही थी।
आपको बता दें कि वर्ष 1950 से लेकर 2015 तक 30 अध्यक्षों का कार्यकाल नगर पालिका बालाघाट के मध्य रह चुका है। इस दौरान शहर के बड़े वरिष्ठ और जाने-माने लोग भी इस पद पर आसीन रह चुके हैं।
नगर पालिका अध्यक्ष पद पर नारायण कृष्ण केलकर, चिन्तामन केलकर, दानवीर एमएम मुलना साहब, शहर को मेंन बोर्ड स्कूल की जमीन दान करने वाले राय दुर्गा प्रसाद, देवी चरण निर्गुण, कन्हैयालाल खरे, बेधनाथ शुक्ला, राय शारदा प्रसाद, विपुल अग्रवाल, सुरेंद्रनाथ खरे, सूरज प्रसाद तिवारी, रवींद्र नाथ शुक्ला, बड़े उद्योगपति के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने वाले रमणिकलाल त्रिवेदी, सीताराम जयसवाल, डॉक्टर श्री जोशी, इंदरचंद चतुरमोहता, शील आनंद, भीम फुलसुंघे इस पद पर क्रमशः आसींन रह चुके हैं।
निश्चित ही राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा पार्षद दल के नेता को अध्यक्ष चुने की व्यवस्था 1995 की तर्ज पर एक बार फिर लागू कर दी गई लेकिन इस कारण स्थानी निर्वाचन प्रक्रिया में हिस्सा लेने वाले और राजनीतिक में जमे रहने वाले कई नेताओं को गहरा झटका लगा है।
इसकी सबसे बड़ी वजह कुछ नहीं तो सीधे अध्यक्ष बनने की चाह रख रहे थे बड़े स्तर पर राजनीति करने का अनुभव तो है लेकिन सीधे जनता से जुड़ाव नहीं जिस कारण पार्षद बनने की उम्मीद उन्हें नहीं है। यदि पार्षद बन भी गए और अध्यक्ष नहीं बने तो पार्षद पद पर रहकर काम करना उनके अनुभव के अनुसार थोड़ा कम आधे वाला पद होगा। इसलिए कुछ ने इस दौड़ से अपने आपको अलग कर लिया तो कुछ यही सोच कर चल रहे हैं कि जीते तो अध्यक्ष या उपाध्यक्ष बनने की कोशिश करेंगे।
बहरहाल चुनावी ऊट किस और करवट लेता है यह तो आने वाला समय बताएगा 18 जुलाई को दूसरे चरण के चुनाव की मतगणना के बाद स्पष्ट हो जाएगा कि किसके सिर पार्षद बनने का ताज सजेगा है उसके बाद पार्षद दल का नेता कौन चुना जाएगा।








































