बदल गया चुनावी परिदृश्य, नहीं रहा टोपी, बिल्ले का क्रेज

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दो दशक में चुनावी परिदृश्य पूरी तरह से बदल चुका है। अब पहले की तरह पोस्टरों-बैनरों से अटी पड़ी गलियां नजर नहीं आतीं। बच्चों में भी टोपी, बिल्ले का क्रेज नहीं रहा। अब मोहल्लों में पार्टियों के झंडे और पंपलेट्स दिखाई नहीं पड़ते। वह समय गुजर गया जब चुनाव की घोषणा से पहले ही प्रिंटिंग प्रेसों में पंपलेट्स, पोस्टर के आर्डर आना शुरू हो जाते थे, जब समर्थक कई सप्ताह पहले ढोलक वालों को बुक कर लेते थे।

वाहन रैलियों के साथ गुजरता समर्थकों का कारवां अब आम बात नहीं रही। दो दशक में चुनावी परिदृश्य में हुए इस बदलाव में तकनीक ने महती भूमिका अदा की है। बुजुर्ग अब भी पुराने चुनाव याद कर बताते हैं कि उन दिनों पार्टियों के कार्यकर्ता गलियों में इतने पोस्टर-बैनर लगाते थे कि उन्हें गिन पाना भी मुश्किल होता था।चुनाव सामग्री की दुकानों पर भीड़ नहींशहर में चुनाव सामग्री की 100 से ज्यादा दुकानें हैं। इन दुकानों पर सिर्फ चुनावी मौसम में ही नहीं बल्कि पूरे वर्ष चुनाव सामग्री उपलब्ध रहती है। दो दशक पहले तक चुनाव पास आते ही इन दुकानों पर भीड़ नजर आने लगती थी। पहाडिया वस्त्रालय इंदौर के अभिषेक पहाडिया के मुताबिक, इन दो दशकों में चुनाव सामग्री के व्यापार में बहुत कमी आई है। पहले पार्टियों के झंडे थोक में बिकते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होता। व्यापारी अभिषेक जैन बताते हैं कि उन दिनों पार्टियों के झंडे तैयार करने का काम कई माह पहले शुरू हो जाता था। चुनाव सामग्री जैसे पोस्टर, बैनर, बिल्ले, टोपियां, स्कार्फ को लेकर भी लोगों में रुचि कम हुई है।

तकनीक ने बदल ली रुचिखास बात यह भी कि तकनीक में हुए बदलाव और व्यस्त दिनचर्या के चलते बच्चों में भी चुनाव को लेकर रुचि कम हुई है। वे भले ही मतदाता न हों लेकिन पहले वे चुनाव प्रचार का एक हिस्सा जरूर होते थे। पार्टियों की टोपियां, बिल्ले, झंडे में उनकी रुचि होती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। एक बड़ा फर्क यह भी है कि इंटरनेट मीडिया के युग में बच्चों के पास आनलाइन गेम की भरमार है। पहले चुनाव प्रचार उनके लिए उत्सवी आयोजन हुआ करता था लेकिन अब ऐसा नहीं रहा।

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