सफलता के ११ वर्ष

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”बालाघाट एक्सप्रेस” ने आज अपने अस्तित्व के ११ वर्ष पूर्ण कर लिया है तथा १२वां वर्ष उसके स्वागत को तैयार है। इन ११ वर्षों में बालाघाट एक्सप्रेस परिवार जो अब काफी हद तक ”पद्मेश” परिवार के नाम से पहचाना जाता है को उसके पाठकों, विज्ञापन दाताओं, अभिकर्ताओं, शुभचिंतकों का भरपूर स्नेह मिला, इसी का परिणाम है कि हमने इन ११ वर्षों तक निरंतर अखबार का (कोविड-१९ महामारी के कारण शुरूआती कुछ दिनों को छोड़कर) लगातार १२ पेज का प्रकाशन किया। इसमें मुझे कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले मेरे संस्थान के सहकर्मियों का महत्वपूर्ण श्रम भी सम्मिलित है, जिसके चलते बालाघाट एक्सप्रेस प्रसार संख्या में आज भी दूसरी पायदान पर जिले में बना हुआ है। यहां यह उल्लेखनीय है कि ग्रामीण क्षेत्र में आज भी ”बालाघाट एक्सप्रेस” पहली पायदान पर है, शहरी पाठकों ने ”बालाघाट एक्सप्रेस” को अपना स्नेह देने में जरूर कंजूसी की है।
हम अपने क्षेत्र, अपने जिले के विकास की बाते करते है, तब गिना देते है कि हमारे यहां अमुक-अमुक चीजें है। हमने कितना विकास किया -कितना नहीं, तब ”बालाघाट एक्सप्रेस” कहीं पीछे छूट जाता है, तब हम हर्षित नहीं होते कि बालाघाट की मिट्टी से निकलने वाला पहला १२ पृष्ठीय एक मात्र दैनिक अखबार ”बालाघाट एक्सप्रेस” है।
बालाघाट पिछड़ा जिला कहलाता है, यहां पर रीडरशीप की कमी है, प्राय: ऐसा देखा जा सकता है जब किसी की रूचि का कोई समाचार किसी अखबार में प्रकाशित होगा तभी वह व्यक्ति उस समाचार पत्र की ओर रूख करता है, लेकिन फिर भी वह अखबार खरीदने की गलती नहीं करेगा, अड़ोसी-पड़ोसी के यहां ताक-झांक करेगा, कि अखबार देखने मिल जाए, जब वहां भी उपलब्ध नहीं होगा तो सीधे अखबार के दफ्तर में पहुंच जाएगा, और वहां तो उसकी मंशा पूर्ण हो ही जाती है।
राजनैतिक गलियारों की बात करें तो कुछ जनप्रतिनिधियों को छोड़ दें तो शेष जनप्रतिनिधियों को जिले में प्रसारित होने वाले किसी भी अखबार से कोई सरोकार नहीं होता है। द्वितीय एवं तृतीय पंक्ति के नेता विज्ञप्तिवीर जरूर होते है मगर जिस दिन विज्ञप्ति छपनी होती है उसी दिन अखबारों में रूचि लेते है। जिले में राजनीतिक शून्यता देखी जा सकती है।
प्रशासन के सामने अखबारनवीसों का उतना ही महत्व है कि जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी सरकारी समाचार छपता रहे, और अधिकारियों की वाह-वाही होती रहे, मतलब शासन-प्रशासन की तारीफे ही होनी चाहिए, समालोचनाएं प्रशासन को पसंद नहीं।
चूंकि बालाघाट छोटा जिला है और यहां समाचारों का टोटा रहता है, इन परिस्थितियों में ६ पेज बालाघाट जिले के समाचारों से भरना एक कठिन कार्य होता है। अभी पिछले छ: माहों से कोरोना के दौर में तो और मुश्किल, हो जाता है। इसके बावजूद हमारे द्वारा निरंतर निर्बाध रूप से १२ पेज के अखबार का प्रकाशन किया जा रहा है। इसके लिये यहां मैं अपनी टीम बालाघाट कार्यालय में कार्यरत मेरे साथी रशीद रजा, अरूण लोधी, संजय बिसेन, अखिलेश जायसवाल, इमरान कुरैशी, महेन्द्र रामटेके, चरणलाल राहंगडाले, सुनील सोलंकी, प्रमोद भेदे, कृष्णा शेण्डे, ओमप्रकाश बिसेन, महेन्द्र सिंह उइके (गुड्डू), निलेश न्यायकर, कमल कोडले, हितेश ठाकरे, संतोष चौहान, राकेश दीवान, सुरेन्द्र मदनकर, पवन सोनवाने, मंगलेश पटले, अंकित सोनवाने, वारासिवनी कार्यालय में अनिल लिल्हारे, राजू पंचेश्वर, सागर देवगड़े, लालबर्रा कार्यालय में मोहसीन खान, राजेश ठकरेले, सुशांत मसीरकर (राजा), नितेश श्रीवास, ला΄जी कार्यालय में दिनेश रामटेक्कर को श्रेय देना चाहूंगा, जिन्होने कोविड-१९ के इस दौर में अपने स्वास्थ्य की चिंता किये बगैर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया। इस अवसर पर मै अपने जिले के मीडिया जगत से जुड़े सभी बंधुओं को भी अपनी ओर से उनके स्वस्थ रहने की कामना करता हुं और शुभकामनाएं देता हुं, उन्होने भी कोरोना काल में बीमारी के भय से मुक्त होकर अपनी-अपनी संस्थाओं के प्रति जवाबदेही का निर्वहन किया है, वे साधुवाद के पात्र है।
स्वास्थ्य कर्मियों, पुलिस कर्मियों, स्थानीय निकायों के कर्मियों को कोरोना वारियर्स कहा जाता है किंतु हम मीडिया कर्मियों को कोई भी कोरोना वारियर्स की दृष्टि से नहीं देखता जबकि आप सभी भी कोरोना वारियर्स हो, अपनी जान जोखिम में डालकर रात-दिन एक करके अपने कत्र्तव्य का पालन कर रहे हो।
”बालाघाट एक्सप्रेसÓÓ की ११वीं वर्षगांठ पर मै अपने पाठकों को आश्वस्त करना चाहता हुं कि ”बालाघाट एक्सप्रेसÓÓ पूर्व की भांति, आपकी अपेक्षा और आकांक्षाओं के अनुरूप सकारात्मक निर्भीक, निष्पक्ष और सशक्त कलम के माध्यम से इस जिले के विकास तथा सर्व हिताय को लेकर अपने पथ पर अग्रसर होता रहेगा।
आप सभी स्वस्थ, प्रसन्न तथा तरक्की के रास्ते पर अग्रसर हो इन्ही शुभकामनाओं के साथ……
आपका
उमेश बागरेचा
प्रधान सम्पादक

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