भारत के डॉ दिलीप महालनोबिस का 88 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने कोलकाता में अंतिम सांस ली। डॉ दिलीप ने डायरिया के मरीजों को डी-हाइड्रेशन से बचाने के लिए ओरल रिहाइड्रेशन की थ्योरी दी थी। उनकी इसी थ्योरी से ओआरएस घोल का निर्माण हुआ। पहली बार 1971 में प्रभावशाली ढंग से भारत और दुनिया के देशों में इसका उपयोग शुरू हुआ। लगभग 6 करोड लोगों की जान बचाने वाले डॉ दिलीप महालनोबिस ने इसका पेटेंट नहीं कराया था। उनका मानना था कि वह उनके डॉक्टरी पेशे का एक अभिन्न कार्य है।
डॉ दिलीप का जन्म 12 नवंबर 1934 को पश्चिम बंगाल में हुआ था। 1958 में उन्होंने कोलकाता मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री ली थी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की मान्यता
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार ओआरएस घोल से दुनिया भर में अभी तक 6 करोड़ लोगों से ज्यादा की जान बचाई गई है। शक्कर और नमक के इस घोल का 1971 में भारत बांग्लादेश बॉर्डर पर युद्ध शरणार्थियों के कैंप में हैजा फैलने के बाद, लाखों लोगों की जान इसी ओआरएस घोल के कारण बचाई गई थी।
डॉ दिलीप महालनोबिस ने पहली बार दिन-रात मरीजों की सेवा कर विश्व स्तर पर भारत की पहचान बनाई थी। लेकिन उनका इतना बड़ा योगदान होने के बाद भी ना तो उन्हें जिंदा रहते हुए,नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नाही भारत सरकार ने कोई राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार उन्हें दिया। उन्होंने कभी भी पुरस्कार के लिए कोई प्रयास भी नहीं किया।
विदेशी पुरस्कार
2002 में डॉ दिलीप को पालिन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2006 में प्रिंस महिडोल अवार्ड उन्हें दिया गया। इससे पहले वह 1994 में रॉयल स्वीडिश अकैडमी आफ साइंसेस के विदेशी सदस्य के तौर पर चुने गए थे।
निर्मोही और दानी
डॉ दिलीप महालनोविस ने बच्चों के एक अस्पताल के लिए अपने जीवन भर की बचत 1 करोड़ रुपए दान कर दी। बच्चों के 1 वार्ड का नाम उनके और उनकी पत्नी के नाम पर रखा गया। यदि उन्होंने ओआरएस का पेटेंट कराया होता, तो उनको करोड़ों रुपयों की प्रतिवर्ष कमाई होती।लेकिन पेशे से डॉक्टर दिलीप हमेशा मरीजों की सेवा एवं जीवन दान देने में विश्वास रखते थे। नाकि पैसे कमाने पर ल,उन्होंने सादा जीवन और उच्च विचार अपनाते हुए भारतीय संस्कृति का जियो और जीने दो का संदेश, देश और दुनिया को दिया है।
भारत रत्न क्यों नहीं
भारत सरकार भारतीय संस्कृति और भारत की महान प्रतिभा द्वारा स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो योगदान दिया गया है। जिसने 6 करोड़ लोगों की जान बचाई, अपनी जिंदगी भर की कमाई दान कर दी। डॉ दिलीप ने 88 साल की उम्र में शांति के साथ परलोक की यात्रा पर चले गए। ऐसे व्यक्ति को यदि मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया जाता है।तो सरकार भारत देश का गौरव सारी दुनिया में बढ़ेगा।










































