- सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पश्चिम बंगाल की सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। एजेंसी ने दावा किया है कि जांच को बाधित करने के लिए प्रभाव, शक्ति और सुरक्षा तंत्र का दुरुपयोग किया गया, डिजिटल साक्ष्यों से छेड़छाड़ हुई और राज्य में संवैधानिक मशीनरी का क्षरण हो चुका है।
- ईडी ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए मामला सीबीआई को सौंपा जाए।
- IPAC दफ्तर में बैकअप रोका गया, CCTV स्टोरेज हटाए गए
- ईडी का सबसे बड़ा आरोप डिजिटल साक्ष्यों को लेकर है। हलफनामे में कहा गया है कि IPAC कार्यालय में कंप्यूटर डेटा का बैकअप रोका गया, CCTV स्टोरेज डिवाइस हटाए गए और जांच से पहले डिजिटल रिकॉर्ड्स में छेड़छाड़ की गई। एजेंसी का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि संगठित तरीके से साक्ष्य नष्ट करने का प्रयास है, जो कानून के तहत गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।
सीएम की Z प्लस सुरक्षा का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए हुआ,ईडी का आरोप
ईडी ने हलफनामे में यह भी आरोप लगाया है किमुख्यमंत्री ममता बनर्जी की Z प्लस सुरक्षा का उपयोग जांच एजेंसियों और गवाहों पर दबाव बनाने के लिए किया गया। ऐसे में सवाल ये कि क्या Z प्लस सुरक्षा किसी व्यक्ति की जान माल की सुरक्षा के लिए दी जाती है। यदि इसका उपयोग जांच प्रभावित करने या एजेंसियों को डराने धमकाने के लिए किया गया हो तो यह पद के दुरुपयोग, सार्वजनिक शक्ति के मनमाने प्रयोग और संवैधानिक नैतिकता के उल्लंघन का मामला बन सकता है।
सीबीआई जांच की मांग
ईडी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि राज्य में कानूनहीनता का माहौल है और स्थानीय पुलिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसलिए निष्पक्ष जांच के लिए CBI को जिम्मेदारी सौंपी जाए।
डिजिटल साक्ष्य और चेन ऑफ कस्टडी का सवाल
ईडी ने कहा है कि डिजिटल साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ हुई है। कानूनी रूप से डिजिटल साक्ष्य की चेन ऑफ कस्टडी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि यह साबित हो जाए कि बैकअप जानबूझकर रोका गया, स्टोरेज डिवाइस हटाए गए या लॉग फाइल्स डिलीट की गईं तो अदालत में अभियोजन की विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ सकता है।
क्या यह संवैधानिक संकट का मामला है?
ईडी ने अपने हलफनामे में संकेत दिया है कि यह मामला केवल आपराधिक जांच का नहीं बल्कि संवैधानिक शासन के क्षरण का है।










































