क्या है जीविका-3? 10 हजार रुपए के बाद अब बिहार की महिलाओं को मिलेंगे कितने रुपए?

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बिहार में ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण की मिसाल बन चुका ‘जीविका’ प्रोजेक्ट अब अपने एक नए और बेहद आधुनिक अवतार में कदम रख चुका है, जिसे ‘जीविका-3’ का नाम दिया गया है। पिछले करीब दो दशकों से बिहार की लाखों महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के जरिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के बाद, अब सरकार का लक्ष्य इन्हें केवल ‘मदद पाने वाला’ नहीं, बल्कि ‘बिजनेस लीडर’ बनाना है। जीविका-3 का मुख्य उद्देश्य बिहार की ग्रामीण महिलाओं को छोटे-मोटे घरेलू कामों से निकालकर बड़े बाजार और मुनाफे वाले बिजनेस मॉडल से जोड़ना है।

क्या है जीविका 3?

जीविका-3 प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत इसका ‘एंटरप्रेन्योरशिप मॉडल’ है। पहले के चरणों (जीविका-1 और 2) में फोकस महिलाओं को संगठित करने, बैंक से लोन दिलाने और बचत की आदत डालने पर था। लेकिन जीविका-3 में अब फोकस ‘वैल्यू चेन’ पर है। इसका मतलब है कि अगर कोई महिला समूह अचार या पापड़ बनाता है, तो सरकार अब उन्हें केवल बनाने की ट्रेनिंग नहीं देगी, बल्कि उनकी ब्रांडिंग, पैकेजिंग और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म (जैसे अमेजन या फ्लिपकार्ट) पर बेचने में भी मदद करेगी। इससे उनकी कमाई में कई गुना इजाफा होगा और वे सीधे तौर पर ‘बिजनेस वुमन’ की श्रेणी में आ जाएंगी।

कितने रुपए मिलेंगे?

जीविका-3 में ‘लखपति दीदी’ अभियान को और भी धार दी जा रही है। लक्ष्य यह है कि कम से कम 10 लाख महिलाओं की सालाना आय 1 लाख रुपये से ऊपर पहुंचाई जाए। इसके लिए कृषि, पशुपालन और गैर-कृषि क्षेत्रों में नए स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया जा रहा है। उदाहरण के लिए, अब गांव की महिलाएं मिलकर ‘प्रोड्यूसर कंपनियां’ बना रही हैं, जो सीधे बड़े कॉर्पोरेट्स से डील करती हैं। इससे बिचौलियों का खेल खत्म हो रहा है और मुनाफा सीधे महिलाओं के बैंक खातों में जा रहा है।

जीविका-3 में तकनीक (Technology) का भी भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है। डिजिटल बैंकिंग, ड्रोन का खेती में उपयोग और स्मार्ट खेती के गुर सिखाने के लिए विशेष ट्रेनिंग सेंटर खोले जा रहे हैं। महिलाओं को अब यह सिखाया जा रहा है कि वे कैसे अपने बिजनेस का हिसाब-किताब मोबाइल ऐप के जरिए रख सकती हैं और कैसे डिजिटल मार्केटिंग का इस्तेमाल कर अपने गांव के उत्पाद को देश-विदेश तक पहुंचा सकती हैं। यह बदलाव न केवल महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधार रहा है, बल्कि समाज में उनकी निर्णय लेने की क्षमता और सम्मान को भी बढ़ा रहा है।

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