देश की सर्वोच्च अदालत ने एक सुनवाई में कहा कि ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता किसी व्यक्ति का सबसे प्रिय अधिकार है, जिसे कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना छीना नहीं जा सकता है’, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक डिटेंशन ऑर्डर को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन लॉ के तहत आदेश पारित करने वाले प्राधिकरण को सभी प्रक्रियात्मक दायित्वों का पालन करना चाहिए, क्योंकि ऐसा आदेश व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को कम करता है। संविधान का अनुच्छेद 21 घोषित करता है कि किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा, सिर्फ कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही ऐसा किया जा सकता है।
पीठ ने कहा, ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जो शायद सबसे अधिक प्रिय है, किसी भी तरह से मनमाने ढंग से या अस्थायी रूप से भी कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना, उससे नहीं छीना जा सकता है।’ शीर्ष अदालत मणिपुर राज्य द्वारा 2021 के उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 2 व्यक्तियों के खिलाफ नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटांस एक्ट के तहत पारित डिटेंशन ऑर्डर को रद्द कर दिया गया था। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि अधिकारी उन दस्तावेजों को पेश करने में विफल रहे, जिनके आधार पर उन्होंने आरोपियों के खिलाफ का डिटेंशन ऑर्डर पारित किया था।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी अपील में, राज्य सरकार ने तर्क दिया कि उच्च न्यायालय का फैसला कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है, क्योंकि आरोपियों ने उन्हें हिरासत में लेने वाले प्राधिकारण के समक्ष संबंधित दस्तावेजों की वैधता को लेकर कभी शिकायत नहीं की थी। राज्य के तर्क का विरोध करते हुए, अधिवक्ता प्रेरणा सिंह, जिन्हें अदालत ने बंदियों में से एक के वकील के रूप में सहायता करने के लिए एमिकस क्यूरी के रूप में नियुक्त किया था, ने जोर देकर कहा कि दस्तावेजों की सुपाठ्य प्रतियों की आपूर्ति करने में विफलता, एक व्यक्ति को डिटेंशन ऑर्डर के खिलाफ प्रभावी प्रतिनिधित्व के उसके अधिकार से वंचित कर देगी।
उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 22(5) किसी व्यक्ति को हिरासत के आदेश के खिलाफ प्रतिनिधित्व करने के लिए जल्द से जल्द अवसर देने का अधिकार प्रदान करता है और इसलिए, राज्य सरकार ‘हिरासत में लिए गए आरोपियों की ओर से प्राधिकारी के समक्ष दस्तावेजों की वैधता को लेकर शिकायत नहीं करने’ को आधार बनाकर एक सरल याचिका नहीं दाखिल कर सकता है। अधिवक्ता प्रेरणा सिंह की दलीलों को स्वीकार करते हुए, शीर्ष अदालत ने माना कि हिरासत में लिए गए आरोपी के अनुरोध पर दस्तावेजों की आपूर्ति से इनकार करना या हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी द्वारा भरोसा किए गए दस्तावेजों की अवैध या धुंधली प्रतियों की आपूर्ति करना संविधान के अनुच्छेद 22(5) का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के आदेश की पुष्टि की और कहा, ‘इस अदालत द्वारा कानूनी स्थिति तय की गई है कि प्रतिनिधित्व करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 22 (5) के तहत किसी भी बंदी का मौलिक अधिकार है। दस्तावेजों की एक अवैध प्रति की आपूर्ति, जिस पर हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी द्वारा भरोसा किया गया है, वास्तव में उसे एक प्रभावी प्रतिनिधित्व करने से वंचित कर दिया है, और इससे इनकार करने से हिरासत का आदेश अवैध होगा और कानून के तहत अपेक्षित प्रक्रिया के अनुसार नहीं होगा।’ अदालत ने कहा, ;एक बार जब बंदी यह संतुष्ट करने में सक्षम हो गया कि उसे डिटेंशन से संबंधित वैध दस्तावेजों की आपूर्ति नहीं की गई थी, जो उसे डिटेंशन के आदेश को चुनौती देने में प्रभावी प्रतिनिधित्व करने से अक्षम बनाता है, तो इसमें अधिकारियों की गलती है। इसलिए डिटेंशन ऑर्डर गैरकानूनी है।’










































