बालाघाट/
शहीद भगत सिंह शासकीय जिला चिकित्सालय को जिले का प्रमुख सरकारी स्वास्थ्य केंद्र माना जाता है। इसे गुणवत्ता प्रमाणपत्र (क्वालिटी सर्टिफिकेट) भी प्राप्त है। जो इस बात का संकेत है कि यहां मरीजों के उपचार के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आती है। सवाल यह है कि जब अस्पताल सर्वसुविधायुक्त है, तो मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख क्यों करना पड़ रहा है?
रिफर की बढ़ती प्रवृत्ति पर सवाल
दुर्घटनाओं में घायल मरीजों को इस अस्पताल में भर्ती करने के बाद अक्सर तुरंत ही हायर सेंटर रेफर कर दिया जाता है। जबकि यहां तीन-तीन ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ पदस्थ हैं। फिर भी हाथ-पैर के फ्रैक्चर जैसे सामान्य मामलों में भी समुचित इलाज नहीं मिल पाता। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या ऑपरेशन (नेलिंग, प्लेटिंग) के लिए आवश्यक संसाधनों की कमी है या फिर विशेषज्ञता का पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा।
माइनर ऑपरेशन भी बन रहे चुनौती
हर्निया, पाइल्स और अपेंडिक्स जैसे सामान्य ऑपरेशन समय पर नहीं किए जाते। मरीजों को लंबी तारीख दी जाती है। जिससे परेशान होकर वे निजी अस्पतालों का सहारा लेने को मजबूर हो जाते हैं। पेट रोग और अन्य सामान्य सर्जरी के मामलों में भी सक्रियता की कमी दिखाई देती है।
पहले बेहतर इलाज होते थे
करीब 10-15 वर्ष पहले, सीमित संसाधनों के बावजूद इस अस्पताल में नियमित रूप से बड़े ऑपरेशन किए जाते थे। उस समय के सर्जन डॉ. के.के. खोसला और डॉ. संजय ढबड़गांव के कार्यकाल में मरीज दूर-दूर से इलाज के लिए उनके नाम लेकर आते थे। दोनो सर्जन चिकित्सक के सेवानिवृत्त होने के बाद ऑपरेशन की संख्या में कमी और रेफर की प्रवृत्ति बढ़ती नजर आती है।
महिला स्वास्थ्य उपचार पर सवाल
ट्रॉमा सेंटर भी विवादों में घिरा हुआ है। प्रसव के लिए भर्ती गर्भवती महिलाओं को पर्याप्त सुविधा नहीं मिलती और कई बार उन्हें निजी अस्पतालों की ओर भेज दिया जाता है। महिलाओं से संबंधित बीमारियों के ऑपरेशन भी यहा नहीं किए जाते। जिससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। ऐसे वर्ग को निजी अस्पताल का रुख अपना कर अपना ऑपरेशन करवाना पड़ता है।
अन्य विभागों की स्थिति भी चिंताजनक
दंत चिकित्सा और मेडिकल वार्ड में भी मरीजों को समुचित उपचार नहीं मिल पा रहा। कई मरीज भर्ती होने के बाद ही निजी अस्पतालों का रुख कर लेते हैं।जो सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। मस्तिष्क और हृदय रोग का इलाज तो इस चिकित्सालय में कोसों दूर है।
बच्चों के इलाज में उम्मीद की किरण
हालांकि, बच्चों के इलाज के मामले में यह अस्पताल एक सकारात्मक उदाहरण बना हुआ है। आसपास के जिलों से भी बाल रोगियों को यहां बेहतर उपचार मिल रहा है। जो इस संस्थान की एक मजबूत कड़ी है।
गुणवता प्रमाण पत्र मिला- किंतु मरीजों को उपचार नही
गुणवत्ता प्रमाणपत्र मिलने के बावजूद यदि मरीजों को बुनियादी उपचार के लिए भी निजी अस्पतालों की ओर जाना पड़े तो यह स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चिंताजनक है। जरूरत है कि प्रशासन इस दिशा में ठोस कदम उठाए। संसाधनों का सही उपयोग सुनिश्चित करे और डॉक्टरों की जवाबदेही तय करे।ताकि मरीजों का भरोसा दोबारा सरकारी अस्पताल पर कायम हो सके।








































