एक्सप्रेस विशेष
पदमेश न्यूज़ |बालाघाट
तकरीबन 37 सालों से लाल आंतक यानी नक्सलवाद का दंश झेल रहे बालाघाट को अब इससे मुक्ति मिल गई है. विगत 11 दिसम्बर को बालाघाट सहित समूचा मध्य प्रदेश नक्सल मुक्त घोषित कर दिया गया, जो कि एक अच्छी खबर है. जिसके बाद से नक्सल प्रभावित रहे आदिवासी बाहुल्य वनांचल क्षेत्रों में विकास की गति अब तेज हो चुकी है. सड़कों व पुल पुलियों का निर्माण, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली पानी सहित तमाम बुनियादी सुविधाओं पर लगातार कार्य जारी है. इसी बीच एक और खबर निकलकर सामने आ रही है कि अब बालाघाट के जंगलों में लौह अयस्क का पता लगाया जा रहा है.
बेस्ट क्वालिटी का लौह अयस्क का पता लगाने पहुंची मशीनें
सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार, बैहर तहसील के पोला पटपरी गांव में मशीनें पंहुची हैं, जो यह खोजने में जुटी हुई है कि बालाघाट के जंगलों में बेहतर लौह अयस्क उपलब्ध हो पाएंगे या फिर नहीं. सूत्रों की मानें तो यह प्रारंभिक चरण है, अगर यहां पर लौह अयस्क पाए जाते हैं तो फिर बालाघाट के जंगलों में खुदाई शुरू की जाएगी, और खनन कर जमीन के अंदर से प्राप्त खनिज पदार्थों को निकालने की प्रक्रिया शुरू होगी. हालांकि अगर ऐसा होता है तो निश्चित तौर पर यहां के लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे, और इन क्षेत्रों का विकास भी होगा.
वनांचल के चिन्हित क्षेत्रों में होगी अयस्क की खुदाई
गौरतलब है कि बालाघाट में वाकई अपार खनिज संपदा विद्यमान है. यदि पूरे वनांचल क्षेत्र में खुदाई की जाए तो कहीं न कहीं कुछ ना कुछ खनिज जरूर प्राप्त हो जाएगा. चूंकि बालाघाट की माटी की प्रवृति ही ऐसी है. यहां पर एशिया की सबसे बड़ी ओपन कास्ट ताम्र परियोजना मलाजखण्ड में स्थित है. हालांकि अब ये भूमिगत खदान हो चुकी है. इसके अलावा देश की सबसे बड़ी भूमिगत मैंगनीज की खदान भरवेली में है. इतना ही नहीं जिले में ऐसी दर्जनों जगहे हैं जहां से खनिज पदार्थ प्राप्त किये जा रहे हैं. इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर वनांचल क्षेत्रों में खुदाई की जाती है तो किसी न किसी प्रकार का खनिज प्राप्त न हो.
चिंता में आदिवासी : क्या धराशायी हो जाएंगे बेशकीमती पेड़
विभिन्न विश्वसनीय सूत्रों तथा वनांचल क्षेत्र के निवासी लोगों से अब यह चर्चा निकलकर आ रही है कि अगर यहां पर खनिज पदार्थों का पता चला और खुदाई शुरू की गई तो फिर यहां के जंगलों का क्या होगा. क्या ये हरे भरे बेशकीमती वृक्ष धराशायी कर दिये जाएंगे? क्या वनों में रहने वाले उन आदिवासियों के सामने रोजगार का संकट उत्पन्न हो जायेगा, जो इन वनों पर पूरी तरह से आश्रित हैं. जो इन्हीं जंगलों से प्राप्त वनोपज से अपना जीवन गुजर बसर करते हैं.
कहीं बेतहाशा खनन से बालाघाट की प्रकृति खत्म ना हो जाए
चिंतनीय यह भी है कि क्या बालाघाट अपनी वह पहचान भी खो देगा, जो 53 प्रतिशत से अधिक वनों के साथ पूरे प्रदेश में अव्वल नंबर पर है. यहां के बेशकीमती वन, यहां की हरियाली, यहां की प्राकृतिक सौंदर्यता, यहां की अनुपम छटा क्या नष्ट कर दी जाएगी.
उधर कहा जा रहा है कि रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे.
जिले के आदिवासी वनांचल क्षेत्र ग्राम पोला पटपरी के जंगलों में लौह अयस्क का पता लगाने के लिए एक मशीन पंहुच चुकी है. जो जंगलों में खनिज पदार्थों का पता लगा रही है. अगर इन वनांचल क्षेत्रों में लौह अयस्कों का पता चलता है तो फिर यहां के लोगों के लिये बेहतर रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे. इन क्षेत्रों में विकास की गति को बढ़ावा मिलेगा, और यहां की आर्थिक स्थिति में बेहतर सुधार देखने को मिल सकते हैं. हालांकि ये प्रारम्भिक चरण है, अगर इन क्षेत्रों में माइनिंग की तलाश हुई तो जिले के दूसरे क्षेत्रों जिनमें माइनिंग संचालित है, उन्ही की तरह वनांचल क्षेत्रों में भी विकास की लहर देखने को मिलेगी, जो कि एक अच्छा संकेत है.








































