संस्कृति विभाग द्वारा श्रीराम कथा साहित्य में वर्णित वनवासी लीलाओं की प्रस्तुतियां आयोजित की जाएंगी !

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मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा रामकथा साहित्य में वर्णित वनवासी चरितों पर आधारित भक्तिमती शबरी और निषादराज गुह्य की वनवासी लीलाओं की प्रस्तुतियां जिला प्रशासन के सहयोग से जिले में पुनः आयोजित होंने जा रही है। 5 नवंबर से 11नवंबर तक आयोजित होने वाली इन लीलाओं की प्रस्तुतियां इस बार रानापुर, रामा ओर पिटोल बड़ी में दी जाएंगी। उल्लेखनीय है कि रामकथा साहित्य की उक्त प्रस्तुतियां गत माह जिले के झाबुआ, पेटलावद, मेघनगर ओर थांदला में दी गई थी, जिन्हें सब स्थानों पर खूब प्रशंसा मिली थी यही नहीं बल्कि समीपवर्ती अंचलों के निवासियों द्वारा भी राम कथा साहित्य की इन प्रस्तुतियों को देखा एवं सराहा गया था।

आयोजन के बारे में प्राप्त हुई जानकारी अनुसार मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा देश के 89 जनजातीय ब्लॉकों में रामकथा साहित्य में वर्णित भक्तिमति शबरी और निषादराजगुह्य की लीला कथाओं की प्रस्तुतियां दी जानी है।  इस क्रम में जिला  प्रशासन-झाबुआ के सहयोग से दो दिवसीय वनवासी लीलाओं की प्रस्तुतियां आयोजित की जा रही हैं। प्रस्तुतियों की इस श्रृंखला के अन्तर्गत 04 नवंबर को जिले के  हाट बाजार मैदान, ग्राम पंचायत पिटोल बड़ी में सुश्री गीतांजलि गिरवाल,  ग्वालियर द्वारा भक्तिमति शबरी एवं और 05 नवंबर को  हिमांशु द्विवेदी ग्वालियर द्वारा लीला नाट्यलीला निषादराज गुह्य, की लीलाओं की प्रस्तुतियां दी जाएंगी। जबकि  09 नवंबर को दशहरा मैदान, रामा  में सुश्री कीर्ति प्रमाणिक, उज्जैन द्वारा भक्तिमति शबरी तथा 10 नवंबर को  विशाल कुशवाहा, उज्जैन द्वारा निषादराजगुह्य लीला नाट्य की प्रस्तुति दी जायेगी। इसी तरह 10 और 11 नवंबर को दशहरा मैदान, उत्कृष्ट विद्यालय के सामने राणापुर में भी वनवासी लीला नाट्य भक्तिमति शबरी तथा निषादराज गुह्य की प्रस्तुतियाँ होंगी। इन दोनों ही प्रस्तुति का आलेख  योगेश त्रिपाठी एवं संगीत संयोजन  मिलिन्द त्रिवेदी द्वारा किया गया है। यह दो दिवसीय कार्यक्रम प्रतिदिन सायं 07.00 बजे से आयोजित किया जाएगा।  

लीला की कथाएं-

रामकथा साहित्य में देवी शबरी 

वनवासी लीला नाट्य भक्तिमति शबरी कथा में दर्शाया गया है कि पिछले जन्म में माता शबरी एक रानी थीं, जो भक्ति करना चाहती थीं लेकिन माता शबरी को राजा ने भक्तिपथ से परे कर दिया, तब शबरी मां गंगा से अगले जन्म में भक्ति करने की प्रार्थना कर गंगा में ही अपने प्राणों का विसर्जन कर दिया। अगले दृश्य में शबरी का दूसरा जन्म और गंगा किनारे गिरि वन में बसे भील समुदाय को गंगा नदी से शबरी का मिलना, भील समुदाय द्वारा शबरी का लालन-पालन और युवावस्था में आने पर उनके विवाह की तैयारियां, लेकिन अपने विवाह में पशु बलि से आहत शबरी द्वारा गृह त्याग, ओर मतंग ऋषि के आश्रम में पहुंचना, जहां ऋषि मतंग द्वारा शबरी को दीक्षा देना, ओर वृद्धावस्था होने के कारण मतंग ऋषि का माता शबरी से यह कहते हुए देह त्याग कर देना कि इस जन्म में मुझे तो भगवान श्रीराम के दर्शन नहीं हुए, लेकिन तुमको प्रभु श्रीराम के दर्शन होंगे। तुम इंतजार करना, भगवान श्रीराम तुम्हें दर्शन देने हेतु आश्रम पर आएंगे। लीला के अगले दृश्य में गिद्धराज मिलाप, कबंद्धा सुर संवाद आदि प्रसंग मंचित किए गए हैं। मंचन में प्रमुखता से भगवान श्रीराम एवं माता शबरी मिलाप का प्रसंग की प्रस्तुति दी गई है। भगवान श्रीराम द्वारा माता शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया जाना, ओर शबरी द्वारा उन्हें माता सीता तक पहुंचने वाले मार्ग के बारे में बताना, लीला नाट्य के अंतिम दृश्य में शबरी की समाधि का मंचन हैं।

वनवासी लीलाओं में निषादराजगुह्य प्रसंग

वनवासी लीला नाट्य निषादराज गुह्य में दर्शाया गया है कि भगवान श्रीराम ने वन यात्रा में निषादराज से भेंट की। निषाद प्रभु श्रीराम से अपने राज्य जाने के लिए निवेदन करते हैं, लेकिन भगवान श्रीराम वनवास में 14 वर्ष बिताने की बात कहकर राज्य जाने से मना कर देते हैं। आगे के दृश्य में गंगा तट पर भगवान श्रीराम केवट से गंगा पार पहुंचाने का आग्रह करते हैं लेकिन केवट बिना पांव पखारे उन्हें नाव पर बैठाने से इंकार कर देता है। केवट की प्रेम वाणी सुनकर ओर प्रभु की आज्ञा पाकर केवट गंगाजल से अपने प्रभु श्री राम के पांव पखारता हैं। नदी पार उतारने पर प्रभु श्रीराम केवट को उतराई देना चाहते हैं, किंतु वह विनय पूर्वक लेने से इंकार कर देता हैं। वह कहता हैं कि हे प्रभु ! मैं तो केवल गंगा ही पार कराता हूं, पर आप तो भवसागर से पार करा देते हैं। इसलिए है प्रभु आप मेरा बेड़ा पार कर देना। लीला के अगले दृश्यों में भगवान श्रीराम का चित्रकूट होते हुए पंचवटी पहुंचना, रावण वध, ओर उनका अयोध्या लौटना। अंत में श्रीराम राज्याभिषेक का मंचन द्रश्य है। लीला नाट्य में भगवान् श्रीराम और वनवासियों के परस्पर सम्बन्ध को अच्छे तरीके से मंचित किया गया है।

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