सुसाइड ट्रीः फल खाने से तुरंत हो जाती है मौत, अब इससे बनेगी कैंसर और अन्य बीमारियों की दवाईयां, बॉयो डीजल भी होगा तैयार

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दुनियाभर में कई जंगली पेड़ मानव जाति और अन्य प्राणियों के लिए घातक है, इन्हीं में से एक ‘‘सुसाइड ट्री’’ भी शामिल है। सेरबेरा ओडोल्लम प्रजाति की ‘‘सुसाइट ट्री’’ का फल या बीज खाने से व्यक्ति की तुरंत मौत हो जाती है, लेकिन अब इसका उपयोग कई बीमारियों से छुटकारा पाने में किया जा रहा है और इसका काफी मेडिसनल महत्व भी है।
रांची स्थित वन उत्पादक संस्थान में आनुवंशिकी एवं वृक्ष सुधार प्रभाग के वरीय वैज्ञानिक डॉ0 अनिमेष सिन्हा ने बताया कि ‘‘सुसाइट ट्री’’ मुख्य रूप से समुद्र के तटीय इलाके में अवस्थित जंगलों में पाया जाता है। इस जंगली और विषाक्त पेड़ का उपयोग कैसे मानव जाति के कल्याण के लिए हो, इसे लेकर लगातार शोध एवं अनुसंधान चल रहे है। हाल के दिनों में इस पेड़ के फल का एंटी कैंसर एक्टिविटी, त्वचा रोग से निदान, कब्ज और अन्य एंटी बैक्टिरियल दवाईयां बनाने में सफलता मिली है। इसके अलावा यह भी जानकारी मिलती है कि श्रीलंका में इसका उपयोग दीया जलाने और मच्छर और अन्य कीटनाशकों को भगाने में किया जाता है। वहीं दुनिया भर के कई देशों ने ‘‘सुसाइट ट्री’’ से बॉयो डीजल बनाने की तकनीक भी तैयार की है। बायोडीजल बनाने में इंडोनेशिया और ताइवान के वैज्ञानिकों को सफलता मिली है। देश में भी इसका मेडिसनल उपयोग को लेकर लगातार कई शोध एवं अनुसंधान के कार्य चल रहे है, जिस कारण से ओडिशा के भीतरकनिका और सुंदरवन इलाके से ‘‘सुसाइट ट्री’’ के पौधों को यहां लाया गया है और इसके संरक्षण एवं मानव जाति के कल्याण में उपयोग को लेकर कार्य चल रहे है। वहीं सुंदरवन का अधिकांश क्षेत्र बांग्लादेश में पड़ता है, वहां भी इसके फल से कई तरह की दवाईयां बनायी जाती है।
वन उत्पादकता संस्थान में कार्यरत तकनीकी पदाधिकारी ए. सरकार और डी. बनर्जी का भी कहना है कि समुद्री इलाके में अवस्थित वन क्षेत्रांे में जल स्तर बढ़ने से सेरबेरा ओडोल्लम प्रजाति के कई पौधों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। इस कारण से अंडमान-निकोबार समूह और ओडिशा समेत अन्य स्थानों से एक दर्जन से भी अधिक जंगली पेड़-पौधों की प्रजातियों को संस्थान में लाकर उसके संरक्षण और विकास को लेकर निरंतर शोध के कार्य किये जा रहे है।
रांची स्थित वन उत्पादकता संस्थान में सेरबेरा ओडोल्लम प्रजाति की विभिन्न पौधों विकसित करने और नया पौध तैयार करने में सफलता मिली है और यह माना जा रहा है कि झारखंड की मिट्टी में भी इनके उपज के लिए उपयुक्त है।

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