उर्दू के बिना तो हिंदी दिनचर्या में बोलना कठिन…यहां तक कि अदालती भाषा- वकालतनामा, दस्ती भी उर्दू: सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली: देश की भाषाई विविधता को तरहीज देते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय में, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (15 अप्रैल) को महाराष्ट्र के एक नगरपालिका बोर्ड पर उर्दू के प्रयोग को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया।सुप्रीम कोर्ट ने चेताया कि भाषा लोगों के बीच विभाजन का कारण नहीं बननी चाहिए और भारत की भाषाई विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उर्दू के बिना तो हिंदी में दिनचर्या में बोलना भी मुश्किल है। यहां तक कि अदालत की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है लेकिन फिर भी उर्दू शब्दों वकालतनामा और दस्ती जैसे तमाम शब्द प्रयोग में है।

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी, जिसमें महाराष्ट्र के अकोला जिले के पाटूर नगर परिषद की नई इमारत के साइनबोर्ड पर उर्दू के उपयोग की अनुमति दी गई थी।जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने माना कि एक अतिरिक्त भाषा का प्रदर्शन महाराष्ट्र स्थानीय प्राधिकरण (राजभाषा) अधिनियम, 2022 का उल्लंघन नहीं है और इस अधिनियम में उर्दू के प्रयोग पर कोई प्रतिबंध नहीं है। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि उर्दू के प्रयोग का उद्देश्य केवल “प्रभावी संवाद” है और भाषाई विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए।

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