(उमेश बागरेचा)
जिला कांग्रेस कमेटी के नए अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर एक अरसे से चर्चाओं का बाजार गर्म है। पिछले दिनों भोपाल के समाचार पत्रों में भी इस आशय को लेकर प्रदेश कांग्रेस के हवाले से खबरें प्रकाशित हुई थी कि प्रदेश के एक दर्जन से अधिक जिलों के कांग्रेस अध्यक्ष बदले जाएंगे, इनमें बालाघाट जिला भी शामिल है। कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए एक समय लोधी समाज के वरिष्ठ इंका नेता उदयसिंह नगपुरे का नाम लगभग तय हो गया था, लेकिन कांग्रेस की स्थानीय स्तर पर आयोजित एक बैठक के दौरान एक कांग्रेसी सदस्य द्वारा उनके खिलाफ की गई टिप्पणी से आहत होने पर उदयसिंह नगपुरे ने जिला अध्यक्ष पद के ऑफर को ठुकरा दिया था, और अभी तक नए अध्यक्ष की तलाश पार्टी द्वारा की जा रही है। पिछले कई वर्षों से पंवार समाज के विश्वेश्वर भगत इस पद पर आसीन है, इनके पूर्व भी पंवार समाज की ही श्रीमती पुष्पा बिसेन भी लगातार कई वर्षों तक अध्यक्ष रहीं है, इस बीच में कलार समाज के प्रदीप जायसवाल भी कुछ वर्ष अध्यक्ष रहे हैं। लगभग 17-18 वर्षों तक विश्वेश्वर भगत एवं श्रीमती पुष्पा बिसेन ने ही अध्यक्षीय कार्यकाल संभाला है। इन लगभग 22 वर्षों के दौरान जिले में कांग्रेस संगठन पूरी तरह चरमरा गया है। जिले में कांग्रेस अनेक गुटों में विभक्त है। भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अर्जुनसिंह के प्रभाव और कुछ हद तक स्वर्गीय श्यामाचरण शुक्ल एवं स्वर्गीय मोतीलाल वोरा के प्रभाव में रहा यह जिला उनके बाद दिग्विजयसिंह एवं कमलनाथ के प्रभाव में चला आ रहा है। जिले के प्रभावशाली नेताओं में से कोई दिग्विजयसिंह के नजदीक है, कोई कमलनाथ के तो कुछ ने दोनों को साध रखा है। दोनों को साध रखने में सबसे अधिक महारथ हासिल की है विश्वेश्वर भगत ने, उसके बाद सुश्री हीना कावरे को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। बैहर विधायक संजय उइके, कटंगी विधायक तामलाल सहारे तथा पूर्व विधायक अशोकसिंह सरसवार, प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह खेमे के माने जाते हैं। जिले में आज भी जमीनी स्तर पर दिग्विजय समर्थकों की कोई कमी नहीं है, दिग्विजय सिंह को भी वरिष्ठ से लेकर निचले स्तर तक के कार्यकर्ताओं तथा उनकी हैसियत, कार्य क्षमताओं की पहचान है। वहीं दूसरी ओर कमलनाथ के दरबार में इन बातों का अभाव है, वहां पर हवाई समर्थकों की भरमार है, इसे यों भी कहा जा सकता है कि जमीनी हकीकत से वहां दूर का भी नाता नहीं है, जिसके चलते जिले में संगठन नाम की कोई चीज नहीं बची है। इस बात को काटने के लिए तर्क दिया जा सकता है कि यदि संगठन सक्रिय नहीं है तो फिर 6 में से 3 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस कैसे काबिज है, तो इसका भी उत्तर है, जो जिले में सत्तासीन एक कांग्रेसी विधायक के मुखारविंद से ही सामने आया है, जिसमें कहा गया है कि हमें संगठन से कोई फर्क नहीं पड़ता, हमारी जीत में संगठन का कोई रोल नहीं है। यहां यह भी हम स्पष्ट कर देना चाहते है कि सत्तासीन कांग्रेसी विधायकों की भी चाहत यही है कि जिला अध्यक्ष निष्क्रिय ही रहे तो ज्यादा बेहतर है, इसी के चलते आज भी उनकी पहली पसंद विश्वेश्वर भगत बने हुए है। श्री भगत से उन्हें राजनैतिक स्तर पर कोई बाधा प्रतीत नहीं होती, क्योंकि उनके विधानसभा क्षेत्रों में संगठन या अन्य कोई भी बातो में श्री भगत दखलंदाजी नहीं करते। इन विधायकों को कठपुतली या निष्क्रिय अध्यक्ष ही चलता है, संगठन में कोई होशियार अध्यक्ष आयेगा तो स्वाभाविक है कि उसकी नजर क्षेत्र की हर गतिविधियों पर रहेगी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ बालाघाट जिले के संदर्भ में जातिगत राजनीति से काफी प्रभावित है, उन्हें लगता है कि बालाघाट जिला दो जाति विशेष समाज में ही समाहित है उसके बाद सारे रास्ते बंद है, इसलिए जब भी संगठन की बात हो या विधानसभा-लोकसभा में प्रत्याशी चयन की बात हो उनकी जिव्हा में सिर्फ और सिर्फ दो जाति समाज ही समाया रहता है। इसमें शायद उनका भी पूरा दोष नहीं है क्योंकि बालाघाट के ही उनकी पार्टी के लोगों ने उनके कानों में ये दो शब्द जमकर भर दिए हैं। इसलिए आज भी जब जिला अध्यक्ष की बात चलती है तो उसमे जाति समाज बीच में आ जाता है, वहां फिर योग्यता दम तोड़ देती है। वैसे जिला कांग्रेस में अध्यक्ष पद को लेकर जो नाम चल रहे है उनमें प्रमुख रूप से कार्यवाहक अध्यक्ष नितिन भोज, सुशील पालीवाल, मधु भगत एवं शेषराम रहांगडाले प्रमुख है और इनमें से कोई नहीं तो फिर विश्वेश्वर भगत तो है हीं जो सभी को भाते हैं वे आलू की तरह सभी में मिक्स होकर हजम हो जाते हैं।










































