तस्वीर के बीच में एक गरीब मछुआरे की बेटी, जिसने हवा में उड़ते लक्ष्य को मार गिराने का धैर्य मछली पकड़कर जीवन यापन करने की कला से विकसित किया। उनके दाहिनी ओर पटियाला शाही परिवार के वंशज की बेटी और बाईं ओर मध्यप्रदेश के इटारसी के एक ड्राई-क्लीनर की बेटी, जो सेना में सबसे कम उम्र की महिला निशानेबाज में से एक है। चीन के हांगझोऊ में जीवन के तीन अलग-अलग चक्र एकसाथ आ गए। मनीषा कीर, राजेश्वरी कुमारी और प्रीति रजक ने मिलकर महिलाओं की टीम शूटिंग ट्रैप इवेंट में भारत का पहला रजत सिल्वर मेडल जीता।
प्रीति रजक और मनीषा कीर को शुरू में एशियाड टीम में जगह नहीं मिली थी, लेकिन ओपनिंग सेरेमनी से चंद रोज पहले बिना किसी स्पष्टीकरण के उन्हें स्क्वॉड में एंट्री मिल गई। चयन में असफलता के कारणों का भले ही आधिकारिक तौर पर खुलासा नहीं किया गया हो, लेकिन निशानेबाजों ने पदक के साथ अपने विरोधियों को गलत साबित कर दिया।
मनीषा कीर: मछली पकड़ने से लेकर शॉटगन थामने तक का सफर
खासतौर पर मनीषा कीर, जिन्होंने चौथी सीरीज में सारे 25 लक्ष्य भेदकर भारत को पोडियम तक पहुंचाया। 24 वर्षीय यह शूटर वीमेंस सिंगल फाइनल में पहुंचने वाली एकमात्र भारतीय भी थे, लेकिन छठे स्थान पर बाहर हो गई। मगर आखिरी में जगह की निशानेबाजी और टीम के लिए सिल्वर मेडल के साथ-साथ उन्होंने और भी बहुत कुछ हासिल किया। शॉटगन शूटिंग, जिसे राजपरिवार का खेल माना जाता है, वहां एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की आम लड़की का पहुंचना खास बात है।
मनीषा को दिग्गज मानशेर सिंह ने दिया मौका
मनीषा कीर की निशानेबाजी की शुरुआत आकस्मिक थी। बचपन में वह अपने पिता के साथ मछलियां पकड़ने और बेचने जाया करती थीं। भारतीय निशानेबाजी के दिग्गज मानशेर से हुई अचानक मुलाकात ने उनकी जिंदगी बदलकर रख दी। ओलिंपियन और अर्जुन पुरस्कार विजेता, मानशेर पिछड़े बैकग्राउंड से आने वाले ऐसे ही लोगों की तलाश में हैं, जो शूटिंग जैसा महंगा खेल नहीं खेल सकते। एमपी राज्य अकादमी के भोपाल स्थित शूटिंग रेंज में उन्होंने एक ट्रायल के दौरान कोने में पीछे खड़ी मनीषा कीर को बेकार खड़ा देखा और उसे शूटिंग का मौका दिया। उस पल के बाद, मनीषा कीर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा, वह भारत की सबसे बेहतरीन महिला शॉटगन निशानेबाजों में से एक बन गईं।










































