एक…..? गए , दूसरे …..? आ गए बच गये बेचारे पांडे जी !

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(उमेश बागरेचा)

तो क्या व्यवस्था में सुधार आ जायेगा ? हम बात कर रहे है जिला चिकित्सालय बालाघाट की । जिला चिकित्सालय में सिविल सर्जन के पद पर पदस्थ डॉ. ए.के. जैन का स्थानांतरण सीएमएचओ नरसिंहपुर के पद पर हो गया है और उनके स्थान पर जिला चिकित्सालय में ही पदस्थ डॉ. अशोक लिल्हारे को सिविल सर्जन पदस्थ किया गया है। अब यहां सवाल उठता है कि इस फेरबदल से क्या जिला चिकित्सालय की बिगड़ी व्यवस्था सुधर जायेगी? देखना होगा, क्या डॉ. जैन अपनी जमी जमाई निजी लैब के साथ-साथ जिला अस्पताल में जमी जमाई क……. को छोडक़र क्या आसानी से नरसिंहपुर चले जायेंगे? दूसरी तरफ डॉ. लिल्हारे के तो दोनों हाथों में लड्डू आ गए, उनका अपना स्वयं का अच्छा खासा नर्सिंग होम संचालित हो ही रहा है और अब अच्छी खासी क…….. वाला सिविल सर्जन का पद भी मिल गया। लेकिन ये लोग अभी भी क्या अपनी सरकारी सेवाओं का ईमानदारी से निर्वहन कर रहे हैं, यदि कर रहे होते तो जिला चिकित्सालय की चिकित्सकीय व्यवस्था इतनी बद्तर नहीं होती। इनके पास निजी प्रैक्टिस से वक्त बचता है तब चहलकदमी करते हुए सरकारी ड्यूटी निभाने आ जाते हैं। डॉ. जैन ने तो बालाघाट जिले का ही सीएमएचओ बनने के लिए ही एड़ी चोटी का जोर लगाया हुआ था, जिसकी प्रशासनिक हलकों में चर्चा भी थी, लेकिन नरसिंहपुर हो गया, खैर बुरा नही है बालाघाट हो या नरसिंहपुर सीएमएचओ विभाग में बजट तो बेहिसाब ही होता है और कौनसी  बालाघाट की अपनी पैथालॉजी लैब बंद करना है , वह तो चलती ही रहेगी। डॉ. जैन का नरसिंहपुर के लिये स्थानांतरण हो जाने पर बच गये बेचारे डॉ. मनोज पांडे, नहीं तो उन पर डॉ. जैन के प्रयासों के चलते ट्रांसफर की तलवार लटक रही थी, शायद ट्रांसफर की इस जोर आजमाईश पर पांडेजी डॉ. जैन पर भारी पड़ गये। इसी तरह अब डॉ. लिल्हारे की भी बांछें खिल गई है, निजी नर्सिंग होम की प्रैक्टिस भी चलती रहेगी और सिविल सर्जन की गद्दी के नीचे बजट भी भरपूर मिलता रहेगा। लेकिन क्या वे चिकित्सालय की व्यवस्था बेहतर बनाए रखने अपनी निजी प्रैक्टिस में से आवश्यक निर्धारित समय निकाल पाएंगे?

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