इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती दादागिरी को रोकने के लिए अमेरिका अब पूरी तरह से भारत पर निर्भर नजर आ रहा है। अमेरिका को समझ आ गया है कि चीन को अकेले घेरना मुमकिन नहीं है, इसलिए यूएस-चाइना इकोनॉमिक एंड सिक्योरिटी रिव्यू कमीशन (USCC) फरवरी 2026 की अपनी पहली सार्वजनिक सुनवाई में पूरा फोकस भारत पर रखने जा रहा है।
वॉशिंगटन में 17 फरवरी को होने वाली यह बैठक मील का पत्थर साबित हो सकती है, जिसमें भारत-चीन तनाव और भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी की नई दिशा तय होगी।सुनवाई के केंद्र में होंगे ये मुख्य मुद्दे
कांग्रेसनल कमेटी इस मीटिंग में भारत के ‘पावर बैलेंस’ की भूमिका की गहन जांच करेगी। मुख्य चर्चा इन बिंदुओं पर होगी…
- मिलिट्री और सुरक्षा: एलएसी (LAC) पर सीमा विवाद, हिंद महासागर में नौसैनिक पहुंच और चीन के खिलाफ भारत की सैन्य क्षमता।
- टेक्नोलॉजी की जंग: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर और फार्मास्युटिकल सप्लाई चेन में आत्मनिर्भर बनने के भारत के प्रयास।
- रणनीतिक समीकरण: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव को कम करने के लिए भारत-अमेरिका की भविष्य की योजनाएं।
टाइमिंग है बेहद खास
यह सुनवाई ऐसे नाजुक मोड़ पर हो रही है जब 2020 के गलवान संघर्ष के बाद पहली बार भारत और चीन के रिश्तों में जमी बर्फ पिघलती दिख रही है। भारत अब सोच-समझकर चीन के लिए अपनी अर्थव्यवस्था को खोलने पर विचार कर रहा है। अमेरिका इस बात की समीक्षा करना चाहता है कि नई दिल्ली और बीजिंग की नजदीकी का उसके आर्थिक और सुरक्षा हितों पर क्या असर पड़ेगा।USCC: अमेरिका का ‘निगरानी तंत्र’
यूनाइटेड स्टेट्स-चाइना इकोनॉमिक एंड सिक्योरिटी रिव्यू कमीशन (USCC) एक द्विदलीय आयोग है, जिसे साल 2000 में बनाया गया था। इसका काम चीन के साथ व्यापारिक संबंधों से अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा पर होने वाले प्रभावों की निगरानी करना और संसद को रिपोर्ट देना है।
भारत क्यों है जरूरी?
पिछले एक दशक में वॉशिंगटन ने भारत में भारी निवेश किया है। अमेरिका के लिए भारत की जियोपॉलिटिकल लोकेशन और उभरती सैन्य शक्ति, चीन को एशिया तक सीमित रखने का एकमात्र प्रभावी जरिया है। बिना भारत के सहयोग के, अमेरिका के लिए ‘इंडो-पैसिफिक’ में चीन की चुनौती का मुकाबला करना असंभव सा है।








































