उज्जैन से करीब 40 किमी दूर सामानेरा और टुकराल गांवों में हुए पुरातात्विक सर्वेक्षण में 2000 साल पुराने अवशेष मिले हैं। इन अवशेषों में गुप्तकालीन दुर्लभ प्रतिमाएं और प्राचीन मंदिरों के कई संकेत मिले हैं, जो महाकाल वन की प्राचीन सीमाओं और मालवा के इतिहास पर नया प्रकाश डालते हैं।उज्जैन: शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित ग्रामीण इलाकों में इतिहास के अनछुए पन्ने पलटे हैं। महाकाल वन की प्राचीन सीमाओं और प्रवेश द्वारों के रहस्यों को टटोलने निकले पुरातत्वविदों को बड़े सुराग हाथ लगे हैं। तपते मालवा की माटी में छिपे प्राचीन वैभव की यह कहानी सामानेरा और टुकराल जैसे गांवों से सामने आई है। यहां हुए पुरातात्विक सर्वे में जो अवशेष मिले हैं, वे इस क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि की गवाही दे रहे हैं।
सामानेरा में मिले 2000 साल पुराने अवशेष
माकड़ौन-तराना क्षेत्र में छोटी कालीसिंध नदी के तट पर बसा सामानेरा गांव महाकाल वन की प्राचीन सीमा से जुड़ा एक अहम केंद्र माना जा रहा है। यहां पुरातत्वविदों को टेराकोटा के खिलौने, प्राचीन मिट्टी के बर्तन (मृद्भांड) और लगभग 2000 साल पुराना शिवलिंग मिलने के संकेत मिले हैं। स्थानीय स्तर पर ब्रह्माणी माता मंदिर परिसर में गुप्तकालीन मानी जाने वाली दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की एक दुर्लभ संयुक्त प्रतिमा भी मौजूद है। इसके अलावा यहां गुप्त और परमार काल की अन्य शिव प्रतिमाएं भी मिली हैं, जिन्हें स्थानीय ग्रामीणों ने सहेज कर रखा है।टुकराल में जमीन के नीचे दबे मंदिर के संकेत
दूसरी ओर, टुकराल गांव के माता खेड़ा यानी नागदेव मंदिर परिसर में भी प्राचीन इतिहास के गहरे सुराग मिले हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यहां बिना गारे के पत्थरों को आपस में जोड़कर बनाई गई परकोटे जैसी संरचना और बेसाल्ट पत्थरों के बड़े खंड मिले हैं। जिस टीले पर वर्तमान मंदिर बना है, उसके ठीक नीचे प्राचीन मंदिर के अवशेष दबे होने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। इस परिसर में हरिहर यानी शिव-विष्णु के संयुक्त स्वरूप के साथ-साथ नवदुर्गा, गणेश, नागदेवता और गंगा-यमुना-सरस्वती की प्राचीन मूर्तियां भी मौजूद हैं।कैसे सामने आया यह इतिहास?
यह पूरा खुलासा ‘अवंती-मालवा क्षेत्र विरासत अनुसंधान और संरक्षण यात्रा’ के तहत सामने आया है। सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलानुशासक और यात्रा के समन्वयक प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा तथा अश्विनी शोध संस्थान के निदेशक व पुरातत्वविद डॉ. रामचंद्र ठाकुर के नेतृत्व में उज्जैन जिले की तराना, उज्जैन, माकड़ौन और महिदपुर तहसीलों का सर्वेक्षण किया गया है। इस दौरान प्रागैतिहासिक काल से लेकर गुप्त और परमार काल तक की वैदिक, शैव, शाक्त और वैष्णव परंपराओं से जुड़े कई साक्ष्य पहचाने गए हैं।
संरक्षण के लिए बनेगी विशेष योजना
इतिहास के इन बिखरे हुए मोतियों को सुरक्षित रखने के लिए अब ठोस कदम उठाने की तैयारी है। सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय और अश्विनी शोध संस्थान की ओर से संगोष्ठी आयोजित करने और श्रमदान के जरिए इन स्थलों के संरक्षण की योजना पर विचार किया जा रहा है।






































