बालाघाट। जिला मुख्यालय स्थित शहीद भगत सिंह शासकीय चिकित्सालय के प्रसूति विभाग की अव्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जानकारी के अनुसार बीते दो दिनों के भीतर 10 गर्भवती महिलाओं को प्रसव कराए बिना ही अस्पताल छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। वहीं पिछले छह माह में लगभग एक सैकड़ा महिलाएं प्रसव के लिए भर्ती होने के बाद बिना प्रसव कराए ही अस्पताल से चली गईं और नगर के निजी अस्पतालों में जाकर प्रसव कराया।
सरकारी योजनाओं का लाभ-लेकिन सुविधाओं का अभाव
मध्य प्रदेश शासन द्वारा शासकीय अस्पतालों में प्रसव कराने वाली महिलाओं को विभिन्न योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता, निःशुल्क उपचार, दवाइयाँ और अन्य सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। इसके बावजूद जिला अस्पताल में प्रसव के लिए भर्ती होने वाली महिलाओं को प्रसव से पहले ही अस्पताल छोड़ना पड़ रहा है।सूत्रों के अनुसार, प्रसूति विभाग में समय पर समुचित उपचार, आवश्यक जांच, विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता और स्पष्ट चिकित्सकीय सलाह का अभाव देखा जा रहा है। कई परिजनों का आरोप है कि प्रसव पीड़ा बढ़ने के बावजूद समय पर ध्यान नहीं दिया जाता।जिससे मरीज और उनके परिजन घबराकर निजी अस्पतालों का रुख करने को मजबूर हो जाते हैं।
निजी अस्पतालों में महंगा प्रसव
जिला अस्पताल छोड़ने के बाद यही महिलाएं नगर के निजी अस्पतालों में 30 से 35 हजार रुपये तक खर्च कर प्रसव कराने को मजबूर हो रही हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह राशि बड़ी चुनौती साबित हो रही है। सवाल यह है कि जब सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क और सुरक्षित प्रसव की व्यवस्था का दावा किया जाता है।तो फिर महिलाएं वहां से क्यों पलायन कर रही हैं?
वर्षों से बनी हुई है समस्या
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रसूति विभाग में अव्यवस्था कोई नई बात नहीं है। पिछले कई वर्षों से यह समस्या बनी हुई है। लेकिन ठोस सुधारात्मक कदम नजर नहीं आ रहे। यदि हालात ऐसे ही बने रहे तो शासन की जननी सुरक्षा एवं मातृ स्वास्थ्य योजनाओं का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
अस्पताल प्रबंधन जिम्मेदार
स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बनाए रखना अस्पताल प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। प्रसूति जैसे संवेदनशील विभाग में लापरवाही गंभीर परिणाम ला सकती है। जरूरत है कि अस्पताल प्रशासन तत्काल समीक्षा कर आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए। विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करे और प्रसूता महिलाओं को भरोसेमंद व सुरक्षित वातावरण प्रदान करे।अब देखना यह है कि जिला अस्पताल प्रबंधन इन लगातार उठ रहे सवालों का क्या जवाब देता है और व्यवस्था सुधारने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते है।









































