हरेन पांड्या हत्याकांड: दोषी मोहम्मद असगर अली की समय से पहले रिहाई की याचिका सुप्रीम 

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इससे पहले जुलाई में गुजरात हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को असगर अली की समय से पहले रिहाई की मांग पर छह महीने के भीतर फैसला लेने का निर्देश दिया था। अब राज्य सरकार ने उसकी रिमिशन याचिका खारिज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर मौजूदा याचिका पर आगे सुनवाई नहीं की।Haren Pandya Murder Case: सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पांड्या की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे मोहम्मद असगर अली की याचिका खारिज कर दी है। असगर अली ने समय से पहले रिहाई की मांग की थी। सुनवाई के दौरान गुजरात सरकार ने कोर्ट को बताया कि उसने दोषी की सजा में छूट देने की याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की बेंच ने 12 अक्टूबर को मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा रिहाई की मांग इनकार किए जाने के बाद इस मामले में आगे सुनवाई जारी रखने की जरूरत नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने असगर अली को गुजरात हाई कोर्ट में राज्य सरकार के फैसले को चुनौती देने की स्वतंत्रता दी।

गुजरात हाई कोर्ट ने छह महीने में फैसला लेने को कहा था

इससे पहले जुलाई में गुजरात हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को असगर अली की समय से पहले रिहाई की मांग पर छह महीने के भीतर फैसला लेने का निर्देश दिया था। अब राज्य सरकार ने उसकी रिमिशन याचिका खारिज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर मौजूदा याचिका पर आगे सुनवाई नहीं की।

2003 में हुई थी हरेन पांड्या की हत्या

गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पांड्या की 26 मार्च 2003 को अहमदाबाद के लॉ गार्डन इलाके में सुबह की सैर के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। सीबीआई के मुताबिक, यह हत्या राज्य में 2002 के सांप्रदायिक दंगों का बदला लेने के लिए की गई थी। जून 2007 में ट्रायल कोर्ट ने इस हत्याकांड में 12 लोगों को दोषी ठहराया था। हालांकि, 2011 में गुजरात हाई कोर्ट ने जांच को ‘त्रुटिपूर्ण’ और ‘गलत दिशा में की गई’ बताते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया था।2019 में सुप्रीम कोर्ट ने बहाल की थी सजा

2019 में सुप्रीम कोर्ट ने हरेन पांड्या हत्याकांड में आरोपियों की दोषसिद्धि और सजा बहाल कर दी थी। मोहम्मद असगर अली इसी मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है। अब सुप्रीम कोर्ट ने रिमिशन याचिका खारिज होने के बाद असगर अली को गुजरात हाई कोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी है।

क्या है रिमिशन और कैसे मिलती है राहत?

रिमिशन का मतलब सजा में छूट देना है। इसमें दोषसिद्धि खत्म नहीं होती, बल्कि कानून और लागू नीति के तहत कैदी की सजा की अवधि में राहत दी जा सकती है। रिमिशन मिलने पर कैदी को बाकी सजा जेल में बिताने से छूट मिल सकती है, लेकिन यह अपने आप मिलने वाला अधिकार नहीं है। सरकार को संबंधित कानून, राज्य की नीति और मामले के तथ्यों के आधार पर फैसला लेना होता है।

रिमिशन के लिए कौन कर सकता है आवेदन?

रिमिशन की प्रक्रिया संबंधित राज्य की नीति और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार शुरू होती है। कैदी खुद या उसकी ओर से कोई व्यक्ति समय से पहले रिहाई के लिए अनुरोध कर सकता है। आम तौर पर जेल प्रशासन के माध्यम से आवेदन संबंधित सरकार या सक्षम प्राधिकारी तक पहुंचता है। कुछ मामलों में लागू नीति के तहत पात्र कैदियों की समीक्षा स्वतः भी की जा सकती है। इसलिए हर मामले में आवेदन की प्रक्रिया और पात्रता एक जैसी नहीं होती।

फैसले से पहले किन बातों पर होता है विचार?

रिमिशन पर विचार करते समय केवल जेल में बिताई गई अवधि ही नहीं, बल्कि कैदी का जेल में आचरण, अनुशासन, सुधार की संभावना, अपराध की गंभीरता और समाज की सुरक्षा जैसे पहलुओं पर विचार किया जाता है। लागू कानूनी प्रक्रिया के तहत संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट और मामले में दोषी ठहराने वाले जज की राय भी मांगी जा सकती है। राज्य की रिमिशन नीति के अनुसार जेल प्रशासन, पुलिस, जिला प्रशासन या संबंधित समिति की भूमिका हो सकती है। हालांकि, किन रिपोर्टों और मानकों पर विचार होगा, यह लागू कानून और नीति पर निर्भर करता है।

क्या 14 साल की सजा काटने के बाद रिहाई मिल जाती है?

सिर्फ 14 साल जेल में बिताने से हर उम्रकैद के कैदी की रिहाई तय नहीं हो जाती। कुछ मामलों में कानून के तहत कम से कम 14 साल की वास्तविक कैद पूरी करना समय से पहले रिहाई पर विचार के लिए जरूरी शर्त हो सकती है। लेकिन पात्रता, अपराध की प्रकृति और लागू रिमिशन नीति के आधार पर अंतिम फैसला सक्षम सरकार को करना होता है। इसलिए 14 साल पूरे होना अपने आप रिहाई का आदेश नहीं है।

रिमिशन की अर्जी खारिज होने पर क्या विकल्प है?

यदि सरकार रिमिशन की अर्जी खारिज कर देती है, तो कैदी उस फैसले को संबंधित हाई कोर्ट में चुनौती दे सकता है। अदालत यह देख सकती है कि फैसला कानून और लागू नीति के अनुसार लिया गया या नहीं, जरूरी तथ्यों पर विचार किया गया या नहीं और निर्णय मनमाना तो नहीं है। हालांकि, हाई कोर्ट में याचिका दायर करने का मतलब यह नहीं कि रिहाई अपने आप मिल जाएगी।

असगर अली के मामले में अब क्या होगा?

पूर्व गुजरात गृह मंत्री हरेन पांड्या हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे मोहम्मद असगर अली की समय से पहले रिहाई की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई आगे नहीं बढ़ाई, क्योंकि गुजरात सरकार ने उसकी रिमिशन अर्जी खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने उसे गुजरात हाई कोर्ट जाने का विकल्प दिया है। अब हाई कोर्ट में चुनौती देते समय सरकार के फैसले और उसे खारिज करने के कारणों को सामने रखना महत्वपूर्ण होगा। असगर अली को राहत मिलेगी या नहीं, यह हाई कोर्ट के समक्ष उठाए गए आधारों और लागू कानून के परीक्षण पर निर्भर करेगा।

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