उज्जैन के जैसे ही यहां भी विराजे हैं भगवान नागचंद्रेश्वर, रात 12 बजे खुलेंगे दर्शन के लिए पट

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सागर: नागपंचमी पर उज्जैन के राजा महाकाल मंदिर और उनके भगवान नागचंद्रेश्वर स्वरूप के दर्शनों की लालसा लाखों लोगों को रहती है। बुंदेलखंड के खैजराधाम में भी भगवान महाकाल और उनके नागचंद्रेश्वर स्वरूप के हूबहू दर्शन होते हैं। बता दें कि सागर में साल 2022 में उज्जैन के महाकाल की तर्ज पर भव्य और दिव्य महाकाल धाम की स्थापना की गई थी। यहां बीते साल ऊपरी तल पर भगवान नागचंद्रेश्वर विराजमान कराए गए थे। मंदिर में उज्जैन महाकाल मंदिर की तर्ज पर पूजा, नीति-रीति, विधि-विधान का पालन किया जाता है।

नागपंचमी पर भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन की लालसा रखने वाले यदि उज्जैन नहीं जा पा रहे हैं, तो वे अपनी इस मनोकामना को सागर के महाकाल धाम खैजरा पहुंचकर पूरा कर सकते हैं। जिला मुख्यालय से लगभग 25 किमी दूर झांसी रोड पर बांदरी के पास खेजरा दरबार महाकाल मंदिर में भगवान नागचंद्रेश्वर विराजमान हैं। बता दें कि उज्जैन की प्रतिकृति के रूप में यहां 7 जुलाई 2024 में पुष्य नक्षत्र के दिन भगवान नागचंद्रेश्वर की प्राण-प्रतिष्ठा की गई थी।

सोमवार रात 12 बजे खुलेंगे नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट

उज्जैन महाकाल मंदिर की विधि अनुसार सागर खैजरा स्थित महाकाल मंदिर में भक्तों के लिये भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन हो सकेंगे। नाग पंचमी की पूर्व संध्या यानी सोमवार 28 जुलाई की रात 12 बजे भगवान नागचंद्रेश्वर के मंदिर के पट खोले जाएंगे, जो नागपंचमी पर 29 जुलाई को रात्रि 12 बजे तक दर्शन के लिए खुले रहेंगे।

दर्शन से कालसर्प दोष, पितृदोष दूर होता है

मंदिर के सेवादार पंडित हिमांशु तिवारी के अनुसार उज्जैन की प्रतिकृति के रूप मे यहां काल भैरव बाबा की प्रेरणा से भगवान नागचंद्रेश्वर की प्राण—प्रतिष्ठा की गई है। भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन मात्र से कालसर्प दोष पितृ दोष, दैहिक, दैविक, तापिक और भौतिक दोषों और रोगों व बाधाओं से मुक्ति मिलती है। भगवान नागचंद्रेश्वर महाकाल धाम खेजरा दरबार में मंदिर की तीसरी मंजिल पर प्रतिष्ठित हैं।

121 साल पुराने मंदिर को मिला भव्य स्वरूप

जानकारों के अनुसार सागर के खैजरा धाम दरबार की स्थापना सन 1904 में ब्रह्मलीन पंडित हरप्रसाद तिवारी द्वारा कराई गई थी। वर्तमान में पंडित महेश तिवारी वैद्यजी द्वारा देख रेख की जा रही है। यहां पर काल भैरव एवं महाकाल की स्थापना भी पहले से है। तब मंदिर का स्वरूप इतना विशाल व भव्य नहीं था। 2013 से मंदिर निर्माण केवल पुष्य नक्षत्र में करके उसको विकसित किया गया। महाकाल की मूर्ति, प्रवेश स्थल से लेकर काफी कुछ उज्जैन की तरह हूबहू स्थापित कराया गया है। महाकाल की वैदिक मंत्रों से प्रतिष्ठा की गई है।

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