AI को चलाने के लिए बड़ी मात्रा में कंप्यूटर और सर्वर की जरूरत होती है। इन्हें रखने के लिए विशाल डेटा सेंटर बनाए जाते हैं। नई रिसर्च में खुलासा हुआ है कि AI डेटा सेंटर आसपास के इलाकों का तापमान 16.4 डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ा सकते हैं। इसका असर 34 करोड़ लोगों पर पड़ेगा।आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। मोबाइल से लेकर कंप्यूटर तक, आज कई काम AI की मदद से किए जा रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस तकनीक को चलाने वाले बड़े-बड़े डेटा सेंटर आसपास के इलाकों को भी गर्म कर रहे हैं? एक नई रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इसके मुताबिक, AI डेटा सेंटर अपने आसपास के इलाकों में तापमान को औसतन 3.6 डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ा सकते हैं। कुछ जगहों पर यह बढ़ोतरी 16.4 डिग्री फारेनहाइट तक दर्ज की गई है। इसका असर इन सेंटरों से कई किलोमीटर दूर रहने वाले लोगों पर भी पड़ सकता है।
डेटा सेंटर कैसे बढ़ा रहे हैं गर्मी?
AI को चलाने के लिए बड़ी मात्रा में कंप्यूटर और सर्वर की जरूरत होती है। इन्हें रखने के लिए विशाल डेटा सेंटर बनाए जाते हैं, जिनमें हजारों सर्वर लगातार काम करते हैं। इन सर्वरों को चलाने में बहुत ज्यादा बिजली खर्च होती है। साथ ही, मशीनों को गर्म होने से बचाने के लिए बड़े कूलिंग सिस्टम भी लगातार काम करते हैं।
इन सभी प्रक्रियाओं के दौरान गर्मी पैदा होती है। रिसर्च के मुताबिक, यही गर्मी डेटा सेंटर के आसपास के इलाकों के तापमान को बढ़ा सकती है। इस स्थिति को ‘हीट आइलैंड’ कहा जाता है। आसान भाषा में समझें तो किसी खास इलाके का तापमान उसके आसपास के दूसरे क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा हो जाना हीट आइलैंड कहलाता है।20 साल के तापमान के आंकड़ों का किया गया अध्ययन
यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के शोधकर्ता एंड्रिया मारिनोनी और उनकी टीम ने इस विषय पर अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने पिछले 20 वर्षों के तापमान से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसके लिए उन्होंने सैटेलाइट और दूसरे रिमोट सेंसिंग सेंसर से मिले आंकड़ों की तुलना बड़े AI डेटा सेंटरों की लोकेशन से की।
इस अध्ययन में 6,000 से ज्यादा ऐसे डेटा सेंटरों को शामिल किया गया, जो घनी आबादी वाले शहरी इलाकों से दूर स्थित हैं। ऐसा इसलिए किया गया, ताकि फैक्ट्रियों, घरों और शहरों की दूसरी गतिविधियों से पैदा होने वाली गर्मी का असर नतीजों पर कम पड़े।
शोधकर्ताओं ने मौसम में बदलाव और ग्लोबल वार्मिंग जैसे दूसरे कारणों को भी ध्यान में रखा, हालांकि यह रिसर्च अभी दूसरे विशेषज्ञों की समीक्षा यानी पीयर रिव्यू से नहीं गुजरी है। इसलिए इसके नतीजों की पुष्टि के लिए आगे और अध्ययन की जरूरत है।
डेटा सेंटर शुरू होने के बाद बढ़ा तापमान
अध्ययन में पाया गया कि किसी डेटा सेंटर के काम शुरू करने के बाद आसपास की जमीन की सतह का तापमान औसतन 3.6 डिग्री फारेनहाइट बढ़ा। कुछ मामलों में यह बढ़ोतरी 16.4 डिग्री फारेनहाइट तक पहुंच गई। यह करीब 9.1 डिग्री सेल्सियस के बराबर है।
रिसर्च में मेक्सिको के बाजियो क्षेत्र और स्पेन के आरागॉन का भी जिक्र किया गया है। ये दोनों इलाके बड़े डेटा सेंटरों के केंद्र बनकर उभरे हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इन क्षेत्रों में पिछले 20 वर्षों के दौरान तापमान में करीब 3.6 डिग्री फारेनहाइट की ऐसी बढ़ोतरी देखी गई, जिसे आसपास के दूसरे इलाकों में उसी तरह नहीं देखा गया।
डेटा सेंटर से 10 किलोमीटर दूर तक असर
इस रिसर्च की सबसे चिंताजनक बात यह है कि डेटा सेंटरों से निकलने वाली गर्मी का असर केवल उनके आसपास तक सीमित नहीं रहता। अध्ययन के मुताबिक, तापमान में बदलाव डेटा सेंटर से करीब 6.2 मील यानी लगभग 10 किलोमीटर दूर तक महसूस किया जा सकता है।
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस तरह के तापमान बदलाव के दायरे में दुनिया भर के 34 करोड़ से ज्यादा लोग आ सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि इन सभी लोगों के स्वास्थ्य पर नुकसान साबित हो चुका है, बल्कि अध्ययन उनके आसपास के इलाकों में तापमान बढ़ने के संभावित असर की ओर इशारा करता है।
AI का बढ़ता इस्तेमाल बन सकता है बड़ी चुनौती
आने वाले वर्षों में AI का इस्तेमाल और बढ़ने की उम्मीद है। इसके साथ ही नए डेटा सेंटर बनाने की रफ्तार भी तेज हो सकती है। ऐसे में अगर इन सेंटरों से निकलने वाली गर्मी को कम करने के उपाय नहीं किए गए, तो आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए परेशानी बढ़ सकती है।पहले से ही ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया के कई हिस्सों में गर्मी और हीटवेव की समस्या गंभीर हो रही है। ऐसे समय में डेटा सेंटरों से होने वाली अतिरिक्त गर्मी चिंता बढ़ाती है। शोधकर्ता एंड्रिया मारिनोनी के मुताबिक, डेटा सेंटरों के विस्तार का असर पर्यावरण, लोगों की भलाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों ने क्या कहा?
लंदन साउथ बैंक यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डेबोरा एंड्रयूज ने कहा कि डेटा सेंटरों के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर पहले से चिंता रही है, लेकिन उनका कहना है कि इनसे बनने वाले हीट आइलैंड पर केंद्रित यह अध्ययन खास है। उनके मुताबिक, AI की दौड़ में टिकाऊ विकास और पर्यावरण के बारे में सोचने की जरूरत पीछे छूटती दिख रही है।
वहीं, बॉर्डरस्टेप इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ शोधकर्ता राल्फ हिंटेमैन का मानना है कि अध्ययन में दिए गए कुछ आंकड़े काफी ज्यादा लगते हैं। उन्होंने कहा कि नतीजों की पुष्टि के लिए और रिसर्च जरूरी है। उनके मुताबिक, डेटा सेंटरों को बिजली देने के लिए होने वाले बिजली उत्पादन से निकलने वाला प्रदूषण भी जलवायु परिवर्तन के लिहाज से एक बड़ी चिंता है।
AI की तरक्की के साथ पर्यावरण का ध्यान रखना जरूरी
इस अध्ययन का मकसद AI के इस्तेमाल को रोकना नहीं, बल्कि इसके बढ़ते पर्यावरणीय असर पर चर्चा शुरू करना है। शोधकर्ताओं का मानना है कि बेहतर योजना, ऊर्जा के अधिक टिकाऊ इस्तेमाल और डेटा सेंटरों को पर्यावरण के अनुकूल बनाने जैसे उपायों पर ध्यान देने की जरूरत है।
AI से लोगों को कई फायदे मिल सकते हैं, लेकिन इसके लिए इस्तेमाल होने वाली तकनीक की कीमत पर्यावरण को न चुकानी पड़े, यह भी जरूरी है। अब चुनौती यही है कि AI की बढ़ती जरूरतों को पूरा करते हुए बिजली की खपत, प्रदूषण और आसपास के इलाकों में बढ़ने वाली गर्मी को कैसे कम किया जाए।










































