IIT Graduate Farmer: मध्य प्रदेश के धार जिले के रुपाखेड़ा और आसपास के गांवों में खेती की पुरानी तस्वीर तेजी से बदल रही है। यहां किसान गेहूं, चना और सोयाबीन की जगह पॉलीहाउस में स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी, रास्पबेरी और महंगे फूल उगा रहे हैं। IIT से पढ़े किसान लखन पाटीदार की कहानी इस बदलाव के साथ बढ़ती युवा किसानों की दिलचस्पी भी दिखाती है।धार: गांव की पगडंडियों से गुजरते हुए गुलाबों की खुशबू दूर तक आती है। लेकिन जैसे ही नजर पॉलीहाउस की कतारों पर पड़ती है, नजारा और भी चौंकाता है। करीने से बने इन संरक्षित खेतों में गुलाब के साथ जरबेरा, लिली और डेजी खिल रहे हैं तो दूसरी ओर चमकदार लाल स्ट्रॉबेरी, गहरे नीले ब्लूबेरी और नाजुक रास्पबेरी भी तैयार हो रही हैं।
यह नजारा नीदरलैंड का नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के धार जिले के रुपाखेड़ा और पड़ोसी गांव तिलगारा का है। यहां सैकड़ों किसान परिवारों ने गेहूं, चना, मक्का और सोयाबीन जैसी पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर विदेशी फलों और महंगे फूलों की खेती का रास्ता अपनाया है। अक्टूबर से फरवरी के बीच इन गांवों की तस्वीर खास तौर पर बदल जाती है। दूर-दूर तक फैले पॉलीहाउस फूलों के रंगों से भर जाते हैं और खेती का यह इलाका किसी अलग ही दुनिया जैसा नजर आने लगता है।IIT से पढ़ाई के बाद गांव लौटे लखन
इस बदलाव की कहानी में 33 वर्षीय लखन पाटीदार का नाम भी खास है। IIT रुड़की से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले लखन ने कॉरपोरेट नौकरी को छोड़कर गांव में पिता के साथ खेती करने का फैसला किया। 2018 में पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एक बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी में नौकरी शुरू की, लेकिन यह नौकरी ज्यादा समय नहीं चली। इसके बाद वह खेती में लौट आए।मैंने नौकरी छोड़ दी और पिता के साथ खेती में आने का फैसला किया। धार में ब्लूबेरी और स्ट्रॉबेरी उगाना कई लोगों को असंभव लगता था। लोग हंसते थे, क्योंकि किसी को भरोसा नहीं था कि गर्म मौसम में ये फल उग सकते हैं। लेकिन मैंने मन बना लिया था।
लखन पाटीदार, किसानलखन के पिता ने तिलगारा में महज आधे एकड़ जमीन में गुलाब की खेतीसे शुरुआत की थी। आज परिवार पांच एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में संरक्षित तरीके से ब्लूबेरी, स्ट्रॉबेरी, रास्पबेरी और फूलों की खेती कर रहा है। पिछले साल लखन ने करीब 250 किलो ब्लूबेरी और 150 किलो रास्पबेरी का उत्पादन किया। इनकी बिक्री मुख्य रूप सेब्लूबेरी की कीमत करीब 800 से 1,200 रुपये प्रति किलो और रास्पबेरी की कीमत 1,000 से 1,500 रुपये प्रति किलो तक रही। पारंपरिक फसलों की तुलना में इन फलों से मिलने वाला प्रतिफल कई गुना ज्यादा रहा।
आधे एकड़ से लाखों की कमाई का दावा
लखन के मुताबिक संरक्षित खेती में कम जमीन पर भी अच्छी आमदनी हासिल की जा सकती है।
सिर्फ 0.25 एकड़ में संरक्षित खेती से किसान आठ से नौ महीने के फसल चक्र में 3 लाख से 5 लाख रुपये तक कमा सकता है।रुपाखेड़ा बना मालवा का ‘बेरी बेल्ट’
धार जिले में रुपाखेड़ा अकेला ऐसा गांव नहीं है जहां खेती का यह बदलाव दिखाई दे रहा है। रुपाखेड़ा, तिलगारा, जावदा और मुलथान को मिलाकर बने इस बागवानी क्षेत्र में विदेशी फलों और संरक्षित खेती का दायरा बढ़ा है। धार के उद्यानिकी विभाग के आंकड़ों के मुताबिक इन इलाकों में 266 किसान 10 हेक्टेयर क्षेत्र में स्ट्रॉबेरी उगा रहे हैं। वहीं 16 किसान 4 हेक्टेयर क्षेत्र में ब्लूबेरी की खेती कर रहे हैं।रास्पबेरी अभी सीमित स्तर पर है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सिर्फ एक किसान 0.25 हेक्टेयर में इसकी खेती कर रहा है। रुपाखेड़ा में इसका असर और साफ दिखाई देता है। गांव में करीब 90 प्रतिशत खेती करने वाले परिवार संरक्षित खेती की ओर बढ़ चुके हैं। यहां करीब 500 किसान परिवार हैं और नई पीढ़ी के पढ़े-लिखे किसान इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
सरकारी योजना से पॉलीहाउस खेती को मिला सहारा
संरक्षित खेती को बढ़ावा मिलने में उद्यानिकी विभाग की योजनाओं की भी भूमिका रही है। विभाग ने केंद्र की MIDH योजना के तहत तकनीकी सहायता और पॉलीहाउस के लिए 19 लाख रुपये तक, जबकि शेड-नेट ढांचे के लिए 14.2 लाख रुपये तक की सब्सिडी का प्रावधान बताया है।रुपाखेड़ा में अब 44 पॉलीहाउस हैं, जो 1.44 लाख वर्गमीटर से ज्यादा क्षेत्र में फैले हैं। इसके अलावा करीब 42 हजार वर्गमीटर क्षेत्र में 13 शेड-नेट हाउस भी हैं।
ब्लूबेरी के लिए तैयार हो रहा 20 एकड़ का क्लस्टर
धार में बागवानी विभाग अब ब्लूबेरी की खेती को और विस्तार देने की तैयारी में है। इसके लिए 20 एकड़ का ब्लूबेरी क्लस्टर विकसित किया गया है, ताकि ज्यादा किसान इस फसल से जुड़ सकें। स्थानीय किसानों को वैज्ञानिक तरीके से खेती सिखाने के लिए अमेरिका के फ्लोरिडा से ब्लूबेरी खेती के विशेषज्ञ को भी प्रशिक्षण देने के लिए बुलाया गया।हमने ज्यादा किसानों को ब्लूबेरी की खेती से जोड़ने के लिए 20 एकड़ का ब्लूबेरी क्लस्टर विकसित किया है। तकनीकी क्षमता बढ़ाने के लिए फ्लोरिडा, अमेरिका से ब्लूबेरी खेती के विशेषज्ञ को भी बुलाया गया। हमारा फोकस संरक्षित खेती का विस्तार करना और इस मॉडल को धार जिले के दूसरे हिस्सों में दोहराना है।
नीरज सावालिया, उप संचालक, उद्यानिकी विभाग, धार
रुपाखेड़ा में फूल, आसपास के गांवों में विदेशी फल
रुपाखेड़ा, तिलगारा, जावदा और मुलथान में खेती का यह बदलाव एक साथ कई रूप ले रहा है। रुपाखेड़ा जहां फूलों की खेती के केंद्र के तौर पर उभरा है, वहीं आसपास के गांवों में किसानों ने विदेशी फलों की ओर रुख किया है। रुपाखेड़ा के करीब 90 प्रतिशत किसान परिवार पारंपरिक फसलों से फूलों और संरक्षित खेती की ओर बढ़ चुके हैं। इस बदलाव में खास तौर पर दूसरी पीढ़ी के पढ़े-लिखे किसान आगे हैं।22 वर्षीय आशीष पाटीदार भी इन्हीं किसानों में शामिल हैं। रुपाखेड़ा के इस युवा किसान ने अपने पिता के साथ आठ एकड़ में तीन तरह के विदेशी फल और करीब दस तरह के फूल उगाने शुरू किए हैं।
हम रतलाम, झाबुआ और आसपास के जिलों से आने वाले किसानों को खेती के तरीके और बाजार की जानकारी बताते हैं, क्योंकि हम चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा युवा खेती को फायदे का पेशा मानें।
आशीष पाटीदार, किसानरुपाखेड़ा और आसपास के गांवों की यह कहानी बताती है कि मालवा की पारंपरिक खेती के बीच अब नए प्रयोग भी अपनी जगह बना रहे हैं। गेहूं, चना, मक्का और सोयाबीन के खेतों के बीच पॉलीहाउस में उगते विदेशी फल और रंग-बिरंगे फूल इस बदलाव की नई तस्वीर पेश कर रहे हैं।










































