West Asia Crisis: अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में हुई शांति वार्ता फेल हो गई है। इस्लामाबाद में 21 घंटे तक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल और ईरानी प्रतिनिधिमंडल के बीच बातचीत हुई, लेकिन इसका नतीजा शून्य रहा। अमेरिकी दल का नेतृत्व खुद उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे थे और ईरान की ओर से विदेश मंत्री अब्बास अराकची। दोनों के बीच मध्यस्थता पाकिस्तान कर रहा था, लेकिन यहां अमेरिका की अपनी शर्तों पर अड़े रहने की जिद और ईरान के न झुकने की जिद ने इस वार्ता को फेल कर दिया। एक बार फिर से पश्चिम एशिया (West Asia) का भविष्य जंग की आहटों में दिखाई दे रहा है।
ट्रंप के सामने अब विकल्प क्या?
ईरान के साथ जब से अमेरिका जंग में गया है, ट्रंप की भाषा बदलती रही है- कभी ईरान को खत्म करने की बात कहते हैं, तो कभी समझौते और शांति की बात करते हैं। अमेरिका की सबसे कमजोर नस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ईरान ने दबा रखा है। होर्मुज बंद होने से अमेरिका के खाड़ी देशों के सहयोगियों का नुकसान सबसे ज्यादा है, क्योंकि उनका तेल उसी रास्ते से निकलता है, जिसमें कई अमेरिकी कंपनियों की भी हिस्सेदारी है। ट्रंप और इजराइल अपनी पूरी ताकत लगाने के बाद भी अभी तक इसे खोल पाने में नाकाम रहे हैं। ट्रंप के सामने अब साफ तौर पर दो रास्ते दिख रहे हैं।
- पहला— ईरान की 10 शर्तों को मानें, जो ईरानी दल ने वार्ता के दौरान अमेरिका के सामने रखी हैं। शांति के लिए बातचीत जारी रखें और ईरान को समझौते के लिए तैयार करें।
- दूसरा— अमेरिका फिर से ईरान के खिलाफ जंग शुरू करे और बमबारी करे, लेकिन इसमें अमेरिका के साथ-साथ उसके खाड़ी देशों को भी तगड़ा नुकसान होगा। ईरान पहले ही 40 दिन तक लड़ चुका है और हार नहीं मानी है। ईरान ने अमेरिका-इजराइल के साथ-साथ खाड़ी देशों पर भी बड़े हमले किए हैं, जिससे वहां काफी नुकसान हुआ है।
- लेबनान पर नेतन्याहू की जिद
- इस शांति वार्ता में सबसे बड़ी बाधा इजराइल की लेबनान को लेकर जिद है। ईरान का साफ कहना है कि लेबनान से इजराइल को निकलना होगा और वहां हमले रोकने होंगे, तभी शांति वार्ता आगे बढ़ेगी। लेकिन इजराइल यह मानने को तैयार नहीं है। इजराइल का कहना है कि हिजबुल्लाह को हथियार डालने होंगे, जिसे ईरान का समर्थन हासिल है। यह भी लगभग नामुमकिन है— हिजबुल्लाह कभी हथियार नहीं डालेगा और ईरान ऐसा होने भी नहीं देगा। साफ है कि जब तक इजराइल लेबनान पर अपनी जिद नहीं छोड़ेगा, शांति स्थापित होने में अड़चनें आती रहेंगी।
- ईरान का मर-मिटने का पागलपन
- सैन्य शक्ति और अर्थव्यवस्था- इन दोनों ही मामलों में ईरान, अमेरिका और इजराइल से काफी पीछे है। लेकिन उसका मर-मिटने का पागलपन इस कदर है कि वह झुकने के लिए तैयार नहीं है। ईरान की पूरी राजनीतिक नेतृत्व से लेकर सैन्य नेतृत्व तक का बड़ा हिस्सा खत्म हो चुका है, लेकिन एक की मौत के तुरंत बाद कोई और उसकी जगह भर देता है और जंग जारी रहती है। ईरान किसी भी कीमत पर हारने को तैयार नहीं है। वह न तो होर्मुज पर पकड़ छोड़ने को तैयार है और न ही लेबनान पर। ऐसे में शांति स्थापित करने के लिए अमेरिका और इजराइल को ही झुकना पड़ेगा। ईरान का भी यही कहना है कि उसने न तो यह युद्ध शुरू किया है और न ही वह इसे खत्म करेगा। जिसने शुरू किया है, वही इसे खत्म करेगा, उसकी शर्तों को मानकर।










































