अमेरिका, इजरायल और ईरान युद्ध के चलते कच्चे तेल की कीमत में आग लगी हुई है। क्रूड ऑयल की कीमत 100 डॉलर के पार पहुंच गई है। इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर हो रहा है। ईरान संकट के कारण दुनिया में महंगाई बढ़ने और मंदी आने का खतरा बढ़ गया है। ईरान युद्ध का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर हुआ है लेकिन इसके बावजूद यह दुनिया में सबसे मजबूत स्थिति में है। यह रेटिंग एजेंसी मूडीज का कहना है।
Moodys Ratings के अनुसार, भारत उभरते बाजारों में 2020 के बाद से सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था बना हुआ है और इसके बड़े विदेशी मुद्रा भंडार ने वैश्विक झटकों के दौरान मुद्रा की अस्थिरता को नियंत्रित करने तथा विश्वास को मजबूत करने में मदद की है। उभरते बाजारों पर अपनी रिपोर्ट में मूडीज ने कहा कि स्पष्ट एवं भरोसेमंद मौद्रिक नीति रूपरेखा, मुद्रास्फीति अपेक्षाओं का स्थिर रहना और जरूरत पड़ने पर विनिमय दरों का समायोजित हो पाना, इन सभी कारणों से भारत भविष्य के झटकों से निपटने के लिए अच्छी स्थिति में है।
बेहतर स्थिति में है भारत
मूडीज ने कहा कि उभरते देशों में भारत ‘बेहतर स्थिति’ में है और भविष्य में किसी भी तनाव के समय में देश मजबूत सुरक्षा बनाए रखेगा। रेटिंग एजेंसी ने कहा कि घरेलू वित्त पोषण पर भारत की निर्भरता स्थानीय बाजारों की मजबूती और बेहतर भंडार से संतुलित होती है। हालांकि, भारत का अपेक्षाकृत उच्च ऋण बोझ और कमजोर राजकोषीय संतुलन लगातार झटकों से निपटने के लिए उपलब्ध गुंजाइश को सीमित करता है। इसमें कहा गया कि हाल के दबाव से पहले ही भारत ने स्थिरता को समर्थन देने वाले महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लिए थे।
उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने ये कदम उठाएं
मूडीज ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में कई बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने वैश्विक स्तर के कई बड़े झटकों को जोखिम उपाय बढ़ाए बिना और तेज वृद्धि या बाजार पहुंच खोए बिना सहन किया है। यह नीतिगत ढांचे में स्थायी सुधार, सुरक्षा उपायों और अनुकूल बाहरी परिस्थितियों को दर्शाता है। मूडीज ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं की अस्थिर वित्तीय परिस्थितियों में उनके वित्त पोषण लागत और बाजार पहुंच के आधार पर उनकी जुझारू क्षमता का आकलन किया।
इसमें भारत, इंडोनेशिया, मेक्सिको, मलेशिया, थाईलैंड, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, तुर्किये और अर्जेंटीना जैसे बड़े उभरते बाजार देशों पर ध्यान केंद्रित किया गया। साथ ही दबाव के चार दौर का विश्लेषण किया गया।
इनमें 2020 की शुरुआत में कोविड-19 वैश्विक महामारी की शुरुआत, 2022 में वैश्विक मुद्रास्फीति में उछाल और उससे जुड़ा अमेरिकी फेडरल रिजर्व का कड़ा मौद्रिक नीति रुख, 2023 की शुरुआत में अमेरिकी क्षेत्रीय बैंकिंग संकट और 2025 में नए सिरे से शुल्क दबाव शामिल हैं।










































