बालाघाट जिले के आदिवासी बहुल बिरसा ब्लॉक में फर्जी एमबीबीएस दस्तावेजों के आधार पर नौकरी हासिल करने वाले डॉक्टर सुनील कुमार सिंह को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। आरोपी ने 17 साल तक सेवा दी और 2023 में ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर के रूप में प्रमोट हुआ था। स्वास्थ्य संकट और बच्चों की मौतों के बीच यह मामला चर्चा में है।बालाघाट: जिले से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां फर्जी एमबीबीएस दस्तावेजों के सहारे सरकारी नौकरी हासिल करने वाला डॉक्टर अभी भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। यह मामला ऐसे समय में चर्चा में आया है जब क्षेत्र में स्वास्थ्य संकट और बच्चों की मौतों का सिलसिला चल रहा है।
17 साल तक फर्जी दस्तावेजों पर नौकरी
आरोपी डॉक्टर सुनील कुमार सिंह ने बालाघाट जिले के आदिवासी बहुल बिरसा ब्लॉक में करीब 17 साल तक सेवाएं दीं। हैरानी की बात यह है कि फर्जी मेडिकल योग्यता के दम पर नौकरी पाने वाला यह शख्स साल 2023 में ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (बीएमओ) के पद पर प्रमोट भी हो गया था। राज्य स्तर पर हुई जांच में योग्यता में अनियमितताएं पाए जाने के बाद उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी, लेकिन अब तक उसकी गिरफ्तारी नहीं हो पाई है।बच्चों की मौतों से क्या है कनेक्शन?
अधिकारियों के मुताबिक, चल रहे स्वास्थ्य संकट के दौरान आधिकारिक रूप से सामने आई 32 बच्चों की मौतों में से कम से कम सात मौतें उस समय हुईं जब आरोपी डॉक्टर जून में छुट्टी पर जाने से पहले तक तैनात था। इनमें से दो मौतें दमोह प्राइमरी हेल्थ सेंटर के क्षेत्र से रिपोर्ट हुईं, जहां बिरसा से हटाए जाने के बाद उसे तैनात किया गया था। हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान में ऐसी कोई सीधी पुष्टि या साक्ष्य नहीं मिले हैं जो उसे बच्चों की इन मौतों से सीधे तौर पर जोड़ सकें।टीकाकरण के आंकड़ों पर भी उठे सवाल
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद क्षेत्र में मीजल्स (खसरा) टीकाकरण के आंकड़ों पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सूत्रों का कहना है कि आरोपी डॉक्टर के कार्यकाल के दौरान 75 प्रतिशत टीकाकरण कवरेज की रिपोर्ट दी गई थी, जबकि प्रशासन अब उस क्षेत्र में नए सिरे से टीकाकरण अभियान चला रहा है जहाँ खसरा कई बच्चों की मौत के पीछे के कारणों में से एक पाया गया था।
75 प्रतिशत टीकाकरण की दी थी जानकारी
बालाघाट के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. शत्रुघ्न सिंह दहिया ने बताया कि आरोपी द्वारा अपने कार्यकाल में 75 प्रतिशत टीकाकरण की जानकारी दी गई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि चूंकि एसएएम से पीड़ित बच्चों के मामले में कई बार टीका असरदार साबित नहीं होता, इसलिए खसरे के मामले सामने आने के बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि पहले टीकाकरण बिल्कुल नहीं हुआ था। फिलहाल, पुलिस मामले की गहराई से जांच कर रही है और स्वास्थ्य टीमें प्रभावित गांवों में लगातार बच्चों के स्वास्थ्य पर नजर बनाए हुए हैं।







































