मेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा पर हैं। पूरी दुनिया की नजरें इस पर लगी हैं। बीते वर्षों में चीन-अमेरिका तनाव में लगातार इजाफा हुआ है। खास तौर पर ट्रंप के सत्ता संभालने के बाद अमेरिका बेहद आक्रामक हुआ है। तमाम एक्सपर्ट यही कहते हैं कि आगामी वर्षों में दोनों देशों की तनातनी और बढ़ेगी। सैन्य ताकत के दम पर चीन सीधे अमेरिका को चुनौती देने की स्थिति में होगा। ऐसा टकराव होगा जिसे टाला नहीं जा सकता। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। अगर कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता में नरमी आ सकती है और तनाव कुछ हद तक कम हो सकता है। ट्रंप और चीनी नेता शी जिनपिंग के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या वे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों को अगले स्तर पर ले जा सकते हैं। युद्ध की जगह क्या दोस्ती और सहयोग ले सकता है।ऐसा हो सकता है लेकिन वाशिंगटन और बीजिंग को अपनी प्रतिस्पर्धा को शांतिपूर्ण रखना होगा। उन्हें कुछ बुनियादी बातों को पूरा करने की कोशिश करनी होगी। अपनी प्रतिद्वंद्विता को सैन्य टकराव के बजाय संस्थानों और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में लगाना होगा। हर असहमति को बातचीत से सुलझाना होगा। समझते हैं कि यह कैसे किया जा सकता है?
1. पारस्परिक संयम बरतना होगा
दोनों देशों को संयम बरतना होगा और सैन्य क्षमताओं के निर्माण में एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं बल्कि संतुलन बनाए रखना होगा। खतरा तब पैदा होता है जब हर पक्ष खुद को यह विश्वास दिलाता है कि उसकी कार्रवाई शत्रुता को रोकने के लिए है, जबकि दूसरा पक्ष इसे उकसावे के रूप में देखता है। ताइवान को लेकर जारी गतिरोध सबसे बड़ा खतरा है। बीजिंग के लिए, ताइवान संप्रभुता का एक प्रमुख मुद्दा और राष्ट्रीय संकल्प की परीक्षा है। वाशिंगटन के लिए, यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा गारंटर के रूप में अमेरिका की विश्वसनीयता, क्षेत्रीय स्थिरता और जबरन एकीकरण को रोकने की उसकी क्षमता से जुड़ा है।










































