सैलून से रोल्स-रॉयस तक! मिलिए देश के सबसे अमीर नाई रमेश बाबू से, जिनकी मेहनत और विजन की दुनिया है दीवानी

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जीवन में सफलता की ऊंचाइयों को छूने के लिए किसी बड़े पारिवारिक बैकग्राउंड या अकूत संपत्ति की नहीं, बल्कि अटूट हौसले, कड़ी मेहनत और अलग हटकर देखने वाले विजन की जरूरत होती है; और इस बात को पूरी दुनिया के सामने सच साबित कर दिखाया है बेंगलुरु के मशहूर ‘बिलियनेयर बार्बर’ रमेश बाबू ने। कभी दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करने और अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए अखबार व दूध बेचने वाले रमेश बाबू आज एक या दो नहीं, बल्कि 400 से अधिक लग्जरी और विंटेज कारों के बेड़े के मालिक हैं, जिसमें रोल्स-रॉयस (Rolls-Royce Ghost), मर्सिडीज-मेबैक (Mercedes-Maybach), बीएमडब्ल्यू, ऑडी और जगुआर जैसी दुनिया की सबसे महंगी और आलीशान गाड़ियां शामिल हैं।

जीरो से हीरो बनने की कहानी

उनकी यह जादुई और प्रेरणादायक यात्रा ‘जीरो से हीरो’ बनने की एक ऐसी बेमिसाल दास्तान है, जो यह सिखाती है कि यदि आप अपने पारंपरिक काम को पूरे सम्मान और लगन के साथ करते हुए सही समय पर सही बिजनेस फैसले लेते हैं, तो आपकी किस्मत बदलते देर नहीं लगती। आज उनका लग्जरी कार रेंटल बिजनेस यानी ‘रमेश टूर्स एंड ट्रैवल्स’ न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर के कॉर्पोरेट दिग्गजों, बॉलीवुड सितारों और विदेशी मेहमानों की पहली पसंद बन चुका है, जिसने उन्हें अरबों का साम्राज्य और वैश्विक पहचान दिलाई है।

रमेश बाबू के इस विशाल बिजनेस एम्पायर की नींव उनके जीवन के सबसे गहरे संघर्षों और अभावों के बीच पड़ी थी, जब साल 1979 में उनके पिता का अचानक निधन हो गया, जो बेंगलुरु में एक छोटा सा सैलून चलाते थे। उस समय रमेश बाबू की उम्र बेहद कम थी, जिसके कारण सैलून को मात्र पांच रुपये प्रति माह के मामूली किराए पर किसी और को चलाने के लिए देना पड़ा और परिवार का गुजारा चलाने के लिए रमेश बाबू को अपनी मां के साथ मिलकर दूसरों के घरों में काम करने से लेकर अखबार बेचने जैसे छोटे-मोटे काम करने पड़े

कैसे हुई शुरुआत?

लेकिन जैसे ही वे बड़े हुए, साल 1989 में उन्होंने दूसरों के भरोसे चल रही अपने पिता की उस छोटी सी दुकान को खुद संभालने का एक साहसिक फैसला लिया और ‘इन्नर स्पेस’ (Inner Space) नाम से एक आधुनिक सैलून की शुरुआत की, जो अपनी बेहतरीन और प्रोफेशनल हेयर कटिंग सेवाओं के कारण जल्द ही पूरे इलाके में काफी लोकप्रिय हो गया। सैलून से होने वाली नियमित कमाई को सही जगह निवेश करने के इरादे से उन्होंने साल 1993 में अपनी जमा-पूंजी और कुछ कर्ज की मदद से एक मारुति ओमनी (Maruti Omni) वैन खरीदी, जिसे वे खुद किराए पर चलाने लगे; और यहीं से उनके जीवन का वह टर्निंग पॉइंट शुरू हुआ जिसने आगे चलकर ‘रमेश टूर्स एंड ट्रैवल्स’ जैसे एक बड़े कार रेंटल ब्रांड का रूप ले लिया।

बाजार को समझा

धीरे-धीरे रमेश बाबू ने बाजार की नब्ज को पहचाना और यह महसूस किया कि आम गाड़ियों के रेंटल बिजनेस में कॉम्पिटिशन बहुत ज्यादा है, लेकिन कॉर्पोरेट और प्रीमियम क्लास के लिए लग्जरी कारों को किराए पर देने वाला कोई बड़ा खिलाड़ी मार्केट में नहीं है। इसी विजन के साथ उन्होंने साल 2004 में भारी वित्तीय जोखिम उठाते हुए एक चमचमाती मर्सिडीज ई-क्लास कार खरीदी, जिसका किराया उस दौर में काफी महंगा था, लेकिन उनके इस दांव ने इतिहास रच दिया और शहर के बड़े बिजनेस घरानों ने उनकी गाड़ी को हाथों-हाथ लिया।

इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपने बेड़े में एक से बढ़कर एक महंगी गाड़ियां शामिल करते गए, जिसमें ₹3 करोड़ से अधिक की रोल्स-रॉयस घोस्ट भी शामिल है, जिसे वे आज भी कई बार खुद ड्राइव करके अपने वीआईपी ग्राहकों तक पहुंचाते हैं। सबसे दिलचस्प और जमीन से जुड़े रहने की बात यह है कि अरबपति बनने और 400 से ज्यादा लग्जरी कारों का मालिक होने के बावजूद, रमेश बाबू आज भी अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं और हर दिन अपने सैलून में जाकर ग्राहकों के बाल काटने का काम पूरी श्रद्धा से करते हैं।

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