खीरे की खेती के लिए केंद्रीय मंत्री को मिली 99 लाख रुपये की सब्सिडी; विवाद को लेकर भागीरथ चौधरी ने दी सफाई

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केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी को कृषि परियोजना के लिए मिली करीब 99 लाख 60 हजार रुपये की सब्सिडी को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। दरअसल, जिस बोर्ड ने इस सब्सिडी को मंजूरी दी है, चौधरी खुद उसके पदेन उपाध्यक्ष हैं। इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि पूरी प्रक्रिया तय नियमों और पात्रता मानकों के तहत पूरी की गई। वहीं, इसमें किसी तरह की अनियमितता नहीं हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सब्सिडी राजस्थान में एक व्यावसायिक खीरा (ककड़ी) खेती परियोजना के लिए मंजूर की गई थी।

बताया गया कि यह परियोजना उस सरकारी योजना के तहत स्वीकृत हुई, जो कृषि मंत्रालय से जुड़ी संस्थागत प्रक्रिया के अंतर्गत संचालित होती है। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि राजस्थान में पुष्कर के पास उनके निजी फार्म प्रोजेक्ट के लिए कृषि मंत्रालय की एक योजना के तहत उनको 99 लाख 60 हजार रुपये की सब्सिडी मिली, लेकिन मंत्री ने ये भी कहा कि उन्होंने सरकारी दिशानिर्देशों का पालन किया था।

मंत्रीजी को कैसे मिली सब्सिडी?

भागीरथ चौधरी को यह सब्सिडी चुनिंदा सब्जियों और फूलों की कमर्शियल खेती को बढ़ावा देने वाली योजना के तहत मिली। 2014-15 में शुरू की गई यह योजना ‘मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर’ (MIDH) के तहत आती है। इसका संचालन ‘नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड’ (NHB) करता है। बता दें कि ये एक स्वायत्त संस्था है, जो उनके मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करती है।

मंत्री भागीरथ चौधरी का 16,592 वर्ग मीटर में खीरे की खेती का प्रोजेक्ट उन 467 प्रोजेक्ट्स में से शामिल था, जिन्हें एनएचबी ने 2025 में “हॉर्टिकल्चर फसलों के उत्पादन और कटाई के बाद के प्रबंधन के जरिए कमर्शियल हॉर्टिकल्चर का विकास” नाम की योजना के तहत मंजूरी दी थी।

भागीरथ चौधरी ने मामले को लेकर क्या कहा?

सब्सिडी को लेकर भागीरथ चौधरी ने कहा कि मैं किसान हूं और खेती करता आया हूं। जहां मैंने प्रोजेक्ट लगाया है, वहां वाटर टेबल लगभग खत्म हो गया है। इसलिए, मैंने 2 करोड़ लीटर पानी के चार फार्म पूल बनाए हैं, जिससे बरसात के पानी से मैं अपनी 60 बीघा जमीन में लगे पेड़-पौधों को पानी दे सकूं और खेती कर सकूं।

मंत्री ने कहा कि उन्होंने बैंक से 2 करोड़ रुपये का लोन लिया है, ये सब उन्होंने सरकारी गाइडलाइंस के आधार पर किया है। वे नई तकनीक से खेती करना चाहते हैं। छिपाकर उन्होंने कोई काम नहीं किया। उन्होंने तो सब्सिडी लेने वाला बोर्ड तक लगाया है, जिससे दूसरे किसान भी उन्नत खेती करने के लिए प्रेरित हों। बोर्ड में सबकुछ लिखा है कि प्रोजेक्ट की कितनी लागत है, इसमें कितनी सब्सिडी मिली।

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