- आजकल के दौर में अपनी मुख्य नौकरी (Full-time Job) के साथ-साथ खाली समय में पार्ट-टाइम काम, फ्रीलांसिंग या कोई छोटा-मोटा बिजनेस करना बहुत आम बात हो गई है। लोग अपनी आमदनी बढ़ाने या अपने पैशन को पूरा करने के लिए ‘मूनलाइटिंग’ या साइड हसल (Side Hustle) का सहारा ले रहे हैं। अतिरिक्त कमाई करना निश्चित रूप से एक बेहतरीन वित्तीय फैसला है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी इस पार्ट-टाइम कमाई पर भी सरकार की नजर होती है? जी हां, इनकम टैक्स नियमों के मुताबिक, नौकरी से मिलने वाली सैलरी के अलावा आप जो भी पार्ट-टाइम कमाई करते हैं, उस पर भी आपको टैक्स देना पड़ता है।
- अधिकांश लोग यह सोचकर इस कमाई को छिपा जाते हैं कि यह तो छोटी रकम है, लेकिन ऐसा करना आपको भारी मुसीबत में डाल सकता है और आयकर विभाग (Income Tax Department) से नोटिस आ सकता है। इसलिए, अगर आप भी सैलरी के साथ पार्ट-टाइम इनकम कर रहे हैं, तो आपके लिए इससे जुड़े टैक्स और आईटीआर (ITR) के नियमों को समझना बेहद जरूरी है।
- पार्ट टाइम कमाई पर कैसे लगेगा टैक्स?
- टैक्स के नजरिए से देखें तो आपकी पार्ट-टाइम कमाई को आपकी मुख्य सैलरी का हिस्सा नहीं माना जाता। आयकर विभाग इस अतिरिक्त कमाई को दो अलग-अलग कैटेगरी में रखता है। पहली कैटेगरी है ‘बिजनेस या प्रोफेशन से होने वाली आय’ (Income from Business or Profession) इसमें फ्रीलांसिंग, कंसल्टेंसी, ट्यूशन पढ़ाना या कोई छोटा डिजिटल काम शामिल होता है। दूसरी कैटेगरी है ‘अन्य स्रोतों से आय’ (Income from Other Sources) इसमें अगर आपको कभी-कभार कोई छोटा-मोटा काम मिला हो या कोई ऐसा काम जिसकी कोई निश्चित कैटेगरी न हो, उसे रखा जाता है। नियम यह है कि वित्तीय वर्ष के अंत में आपकी मुख्य नौकरी की सैलरी और इस पार्ट-टाइम काम से हुई कुल कमाई को आपस में जोड़ दिया जाता है। इसके बाद, आप जिस भी टैक्स स्लैब (जैसे नई या पुरानी टैक्स व्यवस्था) में आते हैं, उसके अनुसार आपकी कुल आय पर टैक्स का निर्धारण किया जाता है।
- पार्ट-टाइम काम करने वालों के लिए एक बड़ी राहत की बात यह है कि वे अपनी इस कमाई पर टैक्स बचा भी सकते हैं। यदि आपकी कमाई ‘बिजनेस या प्रोफेशन’ की कैटेगरी में आती है, तो आप उस काम को करने में हुए जरूरी खर्चों को अपनी कमाई में से घटाकर दिखा सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि आप घर से फ्रीलांसिंग या कोडिंग का काम करते हैं, तो उस काम के लिए इस्तेमाल होने वाले इंटरनेट का बिल, बिजली का बिल, नया लैपटॉप या कंप्यूटर खरीदने का खर्च, और ऑफिस के काम के लिए की गई यात्रा के खर्च को आप अपने बिजनेस एक्सपेंस (व्यावसायिक खर्च) के रूप में क्लेम कर सकते हैं।
- कितना देना होता है टैक्स?
- ऐसा करने से आपकी कुल कर योग्य आय (Taxable Income) कम हो जाती है और आपको कम टैक्स देना पड़ता है। इसके अलावा, छोटे फ्रीलांसरों के लिए ‘प्रिजम्प्टिव टैक्स स्कीम’ (धारा 44ADA) का भी विकल्प होता है, जिसके तहत वे अपनी कुल कमाई का सीधा 50% हिस्सा खर्च मानकर बाकी के 50% पर टैक्स दे सकते हैं।
- नौकरीपेशा लोगों के लिए टैक्स फाइल करते समय सबसे बड़ा कन्फ्यूजन यह होता है कि वे कौन सा आईटीआर फॉर्म (ITR Form) भरें। आमतौर पर सिर्फ सैलरी पाने वाले लोग ITR-1 (सहज) फॉर्म भरते हैं। लेकिन जैसे ही आपकी सैलरी के साथ पार्ट-टाइम या फ्रीलांसिंग की कमाई जुड़ जाती है, आप ITR-1 फॉर्म नहीं भर सकते। ऐसी स्थिति में, यदि आप अपनी पार्ट-टाइम कमाई को बिजनेस या प्रोफेशन की तरह दिखा रहे हैं, तो आपको ITR-3 या फिर प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन के लिए ITR-4 (सुगम) फॉर्म चुनना होगा। गलत फॉर्म भरने पर आपका रिटर्न अमान्य (Defective ITR) घोषित हो सकता है।
- एक और महत्वपूर्ण नियम जो पार्ट-टाइम कमाई करने वालों को याद रखना चाहिए, वह है ‘एडवांस टैक्स’ (Advance Tax) का नियम। अगर आपकी सैलरी पर कंपनी टीडीएस (TDS) काटती है, तो वह सिर्फ आपकी सैलरी के हिसाब से होता है। लेकिन यदि आपकी पार्ट-टाइम कमाई को जोड़ने के बाद आपकी कुल टैक्स देनदारी किसी एक वित्तीय वर्ष में 10,000 रुपये से अधिक बन रही है, तो आपको साल में चार किश्तों (जून, सितंबर, दिसंबर और मार्च) में एडवांस टैक्स जमा करना होगा। यदि आप समय पर एडवांस टैक्स नहीं भरते हैं, तो आपको हर महीने 1% की दर से अतिरिक्त ब्याज देना पड़ सकता है। इसलिए, अपनी दोनों कमाइयों का सही हिसाब रखें, सही आईटीआर फॉर्म चुनें और समय पर टैक्स का भुगतान कर एक जिम्मेदार नागरिक बनें।










































