करीब एक हजार साल पुराने इतिहास, धार्मिक दावों, पुरातात्विक साक्ष्यों और कानूनी बहसों के केंद्र में रहा भोजशाला विवाद (Bhojshala Dispute) अब निर्णायक दौर में पहुंच चुका है। इंदौर हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई में एएसआई (ASI) की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट, संस्कृत शिलालेख, स्थापत्य अवशेष, वाग्देवी प्रतिमा और पूजा-नमाज व्यवस्था सबसे अहम मुद्दे बनकर उभरे हैं।हिंदू पक्ष जहां भोजशाला को मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर और संस्कृत अध्ययन केंद्र मानता है, वहीं मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताते हुए अपने धार्मिक अधिकारों का दावा कर रहा है। वर्षों पुराने इस विवाद में इतिहास, आस्था, पुरातत्व और कानून के जटिल सवाल एक साथ अदालत के सामने हैं।हाई कोर्ट के फैसले से पहले पूरे मामले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, एएसआई सर्वे और विवाद के अहम बिंदु फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं।
क्या है भोजशाला-कमाल मौला विवाद?
भोजशाला को हिंदू पक्ष मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर और संस्कृत अध्ययन केंद्र मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है। यही दोहरे दावे दशकों से विवाद की जड़ बने हुए हैं। वर्तमान में परिसर एएसआइ के नियंत्रण में संरक्षित स्मारक के रूप में है और तय व्यवस्था के अनुसार यहां अलग-अलग दिनों में पूजा और नमाज की अनुमति दी जाती रही है।










































