पाकिस्तान की कैद से रिहा हुआ बालाघाट का युवक, सात साल बाद लौटी खुशियां

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वारासिवनी क्षेत्र का एक युवक, जो बीते सात वर्षों से निर्दोष होते हुए भी पाकिस्तान की जेल में बंद था, आखिरकार आज़ाद हो गया है। 31 जनवरी को पाकिस्तान ने सात भारतीय नागरिकों की रिहाई की गई, जिसमें वारासिवनी निवासी युवक प्रसन्नजीत रंगारी भी शामिल है। इस खबर के सामने आते ही उसके परिवार में खुशी और भावुकता का माहौल बन गया है। प्रसन्नजीत रंगारी को लेने के लिए मंगलवार शाम करीब 8:30 बजे उसके परिजन एक प्रशासनिक कर्मचारी के साथ रवाना होंगे। लंबे संघर्ष और इंतजार के बाद अब परिवार को अपने बेटे और भाई से मिलने का अवसर मिल रहा है। प्रसन्नजीत की बहन ने बताया कि उन्होंने अपने भाई की रिहाई के लिए बीते कई वर्षों तक लगातार प्रशासन और सरकार के समक्ष आवेदन व ज्ञापन सौंपे। हर स्तर पर प्रयास किए गए ताकि उनके भाई को न्याय मिल सके। बहन का यह संघर्ष अब सफल हो पाया है। उन्होंने भावुक होकर बताया कि 1 फरवरी की दोपहर को उनकी अपने भाई से वीडियो कॉल के माध्यम से बातचीत हुई। बातचीत के दौरान प्रसन्नजीत ने अपनी बहन को पहचान लिया, हालांकि उसने यह भी कहा कि इतने वर्षों के बाद उसकी बहन की आवाज में बदलाव आ गया है। बातचीत के दौरान उसने जल्द से जल्द भारत लौटकर परिवार से मिलने की इच्छा जताई।

31 जनवरी को पाकिस्तान की जेलों से सात भारतीय कैदियों को रिहा किया गया। इनमें से छह कैदी पंजाब राज्य के हैं, जबकि एक कैदी बालाघाट जिले का निवासी है। इस युवक का नाम प्रसन्नजीत रंगारी है, जो बीते सात वर्षों से पाकिस्तान की जेल में सुनील अड़े के नाम से बंद था। अब आखिरकार वह भी रिहा हो चुका है और अपने वतन लौटने की प्रक्रिया में है। वर्ष 2021 में प्रसन्नजीत के पाकिस्तान की जेल में बंद होने की पुष्टि होने के बाद से ही उनकी बहन संघमित्रा अपने भाई की रिहाई और भारत वापसी के लिए लगातार प्रयास कर रही थीं। उन्होंने प्रशासनिक दफ्तरों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक कई बार गुहार लगाई, ज्ञापन सौंपे और हर संभव प्रयास किए। यह संघर्ष आसान नहीं था, लेकिन बहन का भरोसा और प्रयास अंततः रंग लाया। संघमित्रा ने बताया कि बीते वर्षों में वह कई बार अलग-अलग सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटती रहीं और नेताओं के दरवाजे खटखटाती रहीं। बीते साल उन्होंने अपने भाई के नाम एक भावुक चिट्ठी भी लिखी थी, जिसमें उसकी सुरक्षित वापसी की कामना की थी। अब, इतने वर्षों के बाद, वह अपने भाई को अपनी मां से मिलवा सकेंगी, यह उनके लिए सबसे बड़ी खुशी है। उन्हें इस बात का गहरा अफसोस भी है कि वह अपने पिता के जीवित रहते भाई को भारत नहीं ला सकीं। 1 फरवरी, रविवार को दोपहर करीब 1 बजे उनके घर फोन की घंटी बजती है और उसी के साथ परिवार में खुशियों का माहौल बन जाता है। प्रसन्नजीत की रिहाई की सूचना उन्हें खैरलांजी पुलिस थाना से मिली। इसके बाद अमृतसर के एक थाने से लगातार फोन आने लगे और प्रसन्नजीत को जल्द भारत लाने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी जाने लगी। सात साल बाद जब संघमित्रा ने अपने भाई की आवाज सुनी, तो वह भावुक हो उठीं। लंबे समय के बाद प्रसन्नजीत अपनी बहन की आवाज पहचान नहीं पाए। जब बहन ने कहा भाई तुम घर आ जाओ तो प्रसन्नजीत ने जवाब दिया मेरे पास टिकट नहीं है, तुम ही मुझे लेने आओ। अब प्रसन्नजीत को लेने के लिए उनके जीजा राजेश अमृतसर जाने वाले हैं। लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने और पर्याप्त शिक्षा न होने के कारण अकेले इतनी दूर जाना उनके लिए मुश्किल था। ऐसे में परिवार ने हर तरफ मदद की गुहार लगाई, ताकि प्रसन्नजीत को कम से कम अमृतसर से सुरक्षित घर लाया जा सके। परिवार की इस परेशानी को देखते हुए जिला प्रशासन और कलेक्टर बालाघाट आगे आए। प्रशासन द्वारा एक प्रशासनिक कर्मचारी के साथ आर्थिक सहायता प्रदान की गई है, ताकि प्रसन्नजीत की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जा सके।

इस प्रकार पहुच गया था प्रसन्नजीत पाकिस्तान

खैरलांजी निवासी प्रसन्नजीत रंगारी वर्ष 2017-18 में अचानक घर से लापता हो गया था। परिजनों की तमाम कोशिशों के बावजूद उसका कोई सुराग नहीं मिला और समय के साथ परिवार ने उसे मृत मान लिया। इसी बीच दिसंबर 2021 में आए एक फोन कॉल ने सबको चौंका दिया प्रसन्नजीत पाकिस्तान की जेल में बंद था। , 1 अक्टूबर 2019 को प्रसन्नजीत को पाकिस्तान के बाटापुर क्षेत्र से हिरासत में लिया गया था। उस समय उस पर कोई ठोस आरोप तय नहीं थे। वह सुनील अड़े नाम से बंद था, लेकिन अब वह पाकिस्तान की कैद से रिहा हो चुका है। प्रसन्नजीत पढ़ाई में मेधावी था। उसके पिता लोपचंद रंगारी ने कर्ज लेकर जबलपुर के गुरु रामदास खालसा इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से उसे बी. फार्मेसी की पढ़ाई करवाई। वर्ष 2011 में उसने एमपी स्टेट फार्मेसी काउंसिल में पंजीयन भी कराया। आगे की पढ़ाई की तैयारी के दौरान मानसिक स्थिति बिगड़ने के कारण उसे पढ़ाई छोड़कर घर लौटना पड़ा, जिसके बाद वह दोबारा लापता हो गया।

आज प्रसन्नजीत को लेने रवाना होंगे परिजन

प्रसन्नजीत की बहन संघमित्रा खोबरागड़े ने बताया कि आर्थिक तंगी के कारण पूरा परिवार उसे लेने नहीं जा पा रहा है। जिला प्रशासन और कलेक्टर मृणाल मीना ने आर्थिक सहायता प्रदान की है। साथ ही एक प्रशासनिक कर्मचारी को भी उनके साथ भेजा गया है। मंगलवार शाम करीब 8:30 बजे तिरोड़ी से प्रसन्नजीत के जीजा राजेश खोबरागड़े और एक प्रशासनिक कर्मचारी उसे लेने के लिए रवाना होंगे।

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