अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर दुनिया की निगाहें टिकी है। जिस रास्ते से हर दिन 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता था, आज वहां पर मौत का पहरा है। यह महज जलमार्ग नहीं, बल्कि इसे ‘दुनिया की नब्ज’ कहा जाता है, जहां से गुजरने वाले तेल के जहाज तय करते हैं कि आपके घर का चूल्हा जलेगा या नहीं।
अगर आप मैप पर नजर डालें तो इसके एक तरफ (उत्तर में) ईरान है, तो दूसरी तरफ (दक्षिण में) ओमान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) मौजूद हैं। तकरीबन 161 किलोमीटर लंबा यह समुद्री गलियारा अपने सबसे संकरे हिस्से में महज 21 मील (करीब 33 किलोमीटर) चौड़ा रह जाता है।
अब सवाल है कि आखिर इस रास्ते को ग्लोबल ट्रेड एनर्जी का ‘बादशाह’ क्यों कहते हैं? दरअसल, इसी संकरे रास्ते से दुनिया के 20 से 25 प्रतिशत कच्चे तेल का व्यापार होता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूएई जैसे बड़े तेल निर्यातक देशों का कच्चा तेल इसी रास्तों से होकर गुजरता है। कतर की तो पूरी एलएनजी (LNG) सप्लाई ही इसी रास्ते से गुजरती है।
‘होर्मुज’ की कहानी
इतिहासकारों के मुताबिक “होर्मुज” शब्द का संबंध प्राचीन फारसी शब्द “होर्मोज” (Hormoz) से है। यह शब्द जोरास्ट्रियन धर्म के देवता अहुरा मज्दा से जुड़ा हुआ माना जाता है। समय के साथ यह नाम बदलते-बदलते “होर्मुज” बन गया। इतिहास में झांके तो पहले पर्शिया के लोग इस समुद्री रास्ते को पवित्र मानते थे और इसे अहुरा मज्दा की सड़क कहते थे।
यह पुराने जोरोस्ट्रियन धर्म के सबसे बड़े देवता अहुरा मज्दा से बना है। इसका मतलब है पुराने पर्शियन इस समुद्री रास्ते को पवित्र मानते थे और इसे अहुरा मज्दा की सड़क कहते थे। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इस जलडमरूमध्य का नाम पास के होर्मुज साम्राज्य या शहर के नाम पर पड़ा। मध्यकाल में यह क्षेत्र व्यापार का बड़ा केंद्र था। धीरे-धीरे उसी नाम से इस समुद्री मार्ग को भी पुकारा जाने लगा।
हर्मुज साम्राज्य का युग (11वीं से 17वीं सदी)
11वीं से 17वीं सदी के बीच इस क्षेत्र पर होर्मुज द्वीप स्थित एक समृद्ध व्यापारिक साम्राज्य का नियंत्रण था। यह साम्राज्य पर्शिया, अरब, भारत और पूर्वी अफ्रीका को जोड़ने वाले समुद्री व्यापार के बड़े केंद्र के रूप में काम करता था।
इस साम्राज्य की समुद्री गतिविधियों और व्यापारिक प्रभुत्व की वजह से इस जलमार्ग को धीरे-धीरे होर्मुज की खाड़ी के नाम से जाना जाने लगा। कुछ इतिहासकारों की मानें तो इस नाम की उत्पत्ति स्थानीय फारसी शब्द “हुर मोघ” से हुई हो सकती है, जिसका अर्थ है खजूर। इस इलाके में खजूर का पौधा आम था, और स्थानीय कबीले ऐतिहासिक रूप से इसी नाम का इस्तेमाल करते थे।
ईरान का ‘हथियार’
कानूनी तौर पर देखें तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर किसी एक देश का मालिकाना हक नहीं है, लेकिन इस संकरे रास्ते पर ईरान की पकड़ बेहद ही मजबूत है। ईरान सालों से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करता रहा है। जब भी अमेरिका उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाता है या सैन्य दबाव बढ़ाता है, ईरान इस जलमार्ग को बंद करने की धमकी देता है।
ईरान का कहना है कि वह अपने समुद्री क्षेत्र और जलमार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है। वहीं अमेरिका इसे अंतरराष्ट्रीय डकैती और दादागिरी के तौर पर देखता है। ईरान के पास करीब 3000 शॉर्ट-रेंज मिसाइलें हैं, जो 200 से 250 किलोमीटर तक मार कर सकती हैं। इसका मतलब यह है कि ईरान आसानी से इस रास्ते से गुजरने वाले किसी भी जहाज पर हमला कर सकता है।
भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण?
अब ये भी जान लीजिए कि आखिर भारत के लिए यह रास्ता कितना मायने रखता है। दरअसल, देश अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है और इसमें से करीब 50 प्रतिशत यानी रोजाना 25–27 लाख बैरल तेल सीधे होर्मुज स्ट्रेट से होकर देश के तटों तक आता है।
हालांकि, भारत के पास सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) मौजूद हैं और देश रूस, अमेरिका सहित 40 से ज्यादा देशों से तेल खरीदता है। लेकिन खाड़ी देशों से तेल भारत पहुंचने में केवल 5–7 दिन लगते हैं, जबकि अटलांटिक या रूस से यह 25–45 दिन में पहुंचता है। इसलिए होर्मुज की छोटी‑सी भी बाधा सीधे भारत के आयात बिल और आपकी जेब पर असर डाल सकती है।
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने एक दिन पहले ही 2500 मरीन सैनिकों को मध्य पूर्व में तैनात करने का आदेश दिया है। ट्रंप का कहना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान की ‘दादागिरी’ नहीं चलेगी। वहीं, खबर सामने आई है कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट में बारूदी सुरंगें बिछा रहा है। अगर अमेरिका और ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ‘जंग ए मैदान’ में बदल डाला तो दुनिया के लिए इससे बुरी खबर और कुछ हो ही नहीं सकती।










































