कोलंबिया में भूकंप से कैसे चली गई 132 लोगों की जान? शोध में सामने आईं इमारतों के ढहने की वजहें, पूरी दुनिया के लिए चिंता

0

Colombia Earthquake Choco: कोलंबिया के चोको प्रांत में सैन जोस डेल पालमार के पास आए शक्तिशाली भूकंप के बाद स्थानीय लोग और अधिकारी बड़े पैमाने पर बचाव एवं राहत अभियान में जुटे हैं। इस भूकंप से काली, मैनिजालेस और पेरेइरा शहरों में भारी नुकसान हुआ है। अब तक कम से कम 132 लोगों की इस प्राकृतिक आपदा में जान जाने की पुष्टि हो चुकी है और आने वाले दिनों में यह संख्या बढ़ने की आशंका है। हजारों मकानों के ढहने या क्षतिग्रस्त होने की खबर है।

अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के अनुसार, 7.4 तीव्रता का यह भूकंप मुख्य रूप से स्ट्राइक-स्लिप भ्रंश (फॉल्ट) के कारण आया। सरल शब्दों में, इस तरह के भूकंप में धरती की पपड़ी के दो हिस्से एक-दूसरे के ऊपर या नीचे जाने के बजाय क्षैतिज दिशा में खिसकते हैं और आपस में टकरा जाते हैं।

यह घटना वेनेजुएला में भूकंप आने के करीब एक महीने बाद हुई है, जिसमें 58 हजार से अधिक इमारतों के नष्ट या क्षतिग्रस्त होने और हजारों लोगों की मौत की आशंका जताई गई थी।

recommended by

Brainberries

Dance Moves That Took Bollywood To Another Level

Learn more

हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि कोलंबिया और वेनेजुएला के भूकंप का आपस में कोई संबंध है या नहीं। लेकिन ऑस्ट्रेलिया में किए गए कुछ अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि आसपास के भूकंपीय भ्रंश एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं। एक भ्रंश पर होने वाली हलचल दूसरे नजदीकी भ्रंश पर दबाव बढ़ाकर भूकंप ला सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, कोलंबिया में अपनाई जाने वाली निर्माण पद्धतियां इस तरह के भूकंप में इमारतों के अधिक नुकसान का कारण बन सकती हैं।

कोलंबिया में निर्माण पद्धतियों की भूमिका

इमारतों में फर्श, बीम और खंभे सामान्य भार को संभालते हैं। लेकिन तेज हवाओं और दुर्लभ लेकिन शक्तिशाली भूकंपों से पैदा होने वाले क्षैतिज दबाव को झेलने के लिए मजबूत कंक्रीट की दीवारों की जरूरत होती है। कोलंबिया में कई इमारतों में कंक्रीट की दीवारें काफी पतली होती हैं, जिनकी मोटाई आमतौर पर 7 से 10 सेंटीमीटर होती है। इनमें मजबूती के लिए इस्पात की केवल एक परत लगाई जाती है, जो अक्सर वेल्डेड वायर जाली होती है। यह जाली काफी कमजोर होती है और जल्दी टूट सकती है।

शोध के अनुसार, दीवारों की कम मोटाई के कारण उनमें अतिरिक्त मजबूती देने वाली इस्पात की संरचना लगाना भी मुश्किल होता है। इसके बावजूद निर्माण मानकों में इसकी अनिवार्यता नहीं है।

प्रयोगों में सामने आईं चिंताजनक बातें

शोधकर्ताओं ने कोलंबिया के तीन विश्वविद्यालयों के सहयोगियों के साथ स्विट्जरलैंड के लॉजेन स्थित अर्थक्वेक इंजीनियरिंग एंड स्ट्रक्चरल डायनेमिक्स प्रयोगशाला में कोलंबिया की निर्माण शैली के अनुसार बनाई गई कंक्रीट की दीवारों का परीक्षण किया। इन परीक्षणों में देखा गया कि भूकंप के दौरान इमारतों में कई छोटी दरारें बनना बेहतर स्थिति होती है, क्योंकि इससे दबाव अलग-अलग हिस्सों में बंट जाता है।

दुनिया के लिए चिंता की बात

लेकिन कम मात्रा में इस्पात होने के कारण एक बड़ी दरार बनने की संभावना बढ़ जाती है। इससे दबाव एक ही जगह केंद्रित हो जाता है और इस्पात टूटने के साथ दीवार गिर सकती है।

शोध में यह भी पाया गया कि दीवारों की कम मोटाई के कारण पर्याप्त इस्पात लगाए जाने के बावजूद वे तेज भूकंप के झटकों को सहन करने में सक्षम नहीं हो सकतीं। यह समस्या केवल कोलंबिया तक सीमित नहीं है। लातिन अमेरिका के कई देशों में इसी तरह की निर्माण पद्धति अपनाई जाती है।

2018 में भूकंप प्रभावित शहर काली में नौ इमारतों के सर्वेक्षण में पाया गया कि 90 प्रतिशत इमारतों में केवल एक परत वाली, इस्पात की मजबूती वाली दीवारें थीं और 30 प्रतिशत इमारतों में दीवारों की मोटाई 100 मिलीमीटर या उससे कम थी।

दुनिया के अन्य हिस्सों में भी चिंता

2011 में न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में 6.3 तीव्रता के भूकंप से भारी तबाही हुई थी, जिसमें 185 लोगों की मौत हुई थी। 1980 के बाद बनाए गए ज्यादातर कंक्रीट भवनों ने इस भूकंप में बेहतर प्रदर्शन किया, क्योंकि उस समय निर्माण नियमों में बदलाव किए गए थे और इंजीनियरों को इस बात पर ध्यान देना होता था कि इमारतों में इस्पात का इस्तेमाल किस तरह किया जाए ताकि वे भूकंप के दबाव को सह सकें।

हालांकि, कुछ पुराने भवन ढह गए थे। इनमें पाइन गोल्ड भवन भी शामिल था। माना गया कि इसके ढहने की वजह पतली कंक्रीट दीवारों में कम मात्रा में इस्पात का इस्तेमाल था, जिसके कारण एक बड़ी दरार बनी और पूरा दबाव उसी जगह केंद्रित हो गया।

ऑस्ट्रेलिया में भी कुछ समय पहले तक पतली दीवारों और कम इस्पात वाली ऐसी निर्माण पद्धति को अनुमति थी। क्राइस्टचर्च भूकंप के बाद इस पर चिंता जताई गई और 2018 में निर्माण मानकों में बदलाव किए गए।

हालांकि, इससे पहले बनाए गए कई भवनों में अब भी ऐसी कमजोर संरचनाएं मौजूद हो सकती हैं। ऑस्ट्रेलिया में किए गए परीक्षणों से भी पता चला है कि ऐसी दीवारें भूकंप के दौरान कोलंबिया की इमारतों जैसी ही कमजोर साबित हो सकती हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया भी शक्तिशाली भूकंपों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है और कमजोर निर्माण पद्धतियों वाले क्षेत्रों पर ध्यान देना जरूरी है।

लेटेस्ट न्यूज

education

कम विद्यार्थियों वाले पाठ्यक्रमों में भी मेधावी छात्राओं को मिलेगी स्कूटी, यूपी सरकार की नई तैयारी

utility news

बिहार में राशन कार्ड से हट गया नाम? जानें शिकायत से लेकर दोबारा जोड़ने का पूरा तरीका

crime

सुनील शेट्टी की फोटो काटकर बनाई गई थी श्री प्रकाश शुक्ला की पहली तस्वीर, पूर्व IPS राजेश पांडे से सुनिए दिलचस्प किस्सा

business

Financial Freedom क्या है? लाखों की सैलरी भी पड़ रही कम, कैसे मिलेगी पैसों की तंगी से आजादी?

lifestyle

प्रिंसेस ट्रीटमेंट या बस बेसिक रिस्पेक्ट? रिश्तों में कब छोटी चीजें बड़ी बन गईं, लड़कियां जरूर पढ़ें

cities

Greater Noida: महागुन मायवुड्स सोसायटी में पानी को लेकर हंगामा, 2 दिन से सप्लाई ठप; सड़क पर उतरे निवासी

sports

भारतीय जिमनास्ट आशीष कुमार चयन मानदंडों को पूरा नहीं करने के कारण GFI की एसओएम टीम से बाहर

lifestyle

खादी सिर्फ कपड़ा नहीं, आजादी की कहानी है! चर्खे से लेकर फैशन रैंप तक ऐसे बदला इस देसी फैब्रिक का अंदाज

Nitin Arora

नितिन अरोड़ाauthor

नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदेश की बड़ी घटनाओं और समसामयिक मुद्दों को गहराई से समझकर उन्हें सटीक और सरल भाषा में प्रस्तुत करने में माहिर हैं। उन्होंने अपने करियर में लगातार करंट अफेयर्स, पॉलिटिकल डेवलपमेंट्स, डिप्लोमैटिक घटनाएं और डिफेंस सेक्टर से जुड़े विषयों पर प्रभावशाली कॉन्टेंट तैयार किया है और अबतक 6 हजार से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं। विभिन्न टॉपिक्स पर एक्सप्लेनेर, डेटा-आधारित रिपोर्ट्स और विश्लेषणात्मक कॉपी लिखने में उनकी मजबूत पकड़ है।और पढ़ेंलेकिन कम मात्रा में इस्पात होने के कारण एक बड़ी दरार बनने की संभावना बढ़ जाती है। इससे दबाव एक ही जगह केंद्रित हो जाता है और इस्पात टूटने के साथ दीवार गिर सकती है।

शोध में यह भी पाया गया कि दीवारों की कम मोटाई के कारण पर्याप्त इस्पात लगाए जाने के बावजूद वे तेज भूकंप के झटकों को सहन करने में सक्षम नहीं हो सकतीं। यह समस्या केवल कोलंबिया तक सीमित नहीं है। लातिन अमेरिका के कई देशों में इसी तरह की निर्माण पद्धति अपनाई जाती है।

2018 में भूकंप प्रभावित शहर काली में नौ इमारतों के सर्वेक्षण में पाया गया कि 90 प्रतिशत इमारतों में केवल एक परत वाली, इस्पात की मजबूती वाली दीवारें थीं और 30 प्रतिशत इमारतों में दीवारों की मोटाई 100 मिलीमीटर या उससे कम थी।

दुनिया के अन्य हिस्सों में भी चिंता

2011 में न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में 6.3 तीव्रता के भूकंप से भारी तबाही हुई थी, जिसमें 185 लोगों की मौत हुई थी। 1980 के बाद बनाए गए ज्यादातर कंक्रीट भवनों ने इस भूकंप में बेहतर प्रदर्शन किया, क्योंकि उस समय निर्माण नियमों में बदलाव किए गए थे और इंजीनियरों को इस बात पर ध्यान देना होता था कि इमारतों में इस्पात का इस्तेमाल किस तरह किया जाए ताकि वे भूकंप के दबाव को सह सकें।

हालांकि, कुछ पुराने भवन ढह गए थे। इनमें पाइन गोल्ड भवन भी शामिल था। माना गया कि इसके ढहने की वजह पतली कंक्रीट दीवारों में कम मात्रा में इस्पात का इस्तेमाल था, जिसके कारण एक बड़ी दरार बनी और पूरा दबाव उसी जगह केंद्रित हो गया।

ऑस्ट्रेलिया में भी कुछ समय पहले तक पतली दीवारों और कम इस्पात वाली ऐसी निर्माण पद्धति को अनुमति थी। क्राइस्टचर्च भूकंप के बाद इस पर चिंता जताई गई और 2018 में निर्माण मानकों में बदलाव किए गए।

हालांकि, इससे पहले बनाए गए कई भवनों में अब भी ऐसी कमजोर संरचनाएं मौजूद हो सकती हैं। ऑस्ट्रेलिया में किए गए परीक्षणों से भी पता चला है कि ऐसी दीवारें भूकंप के दौरान कोलंबिया की इमारतों जैसी ही कमजोर साबित हो सकती हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया भी शक्तिशाली भूकंपों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है और कमजोर निर्माण पद्धतियों वाले क्षेत्रों पर ध्यान देना जरूरी है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here