पाटन पोला पर्व आज, तो नारबोद कल, पोला नारबोद की तैयारियों में जुटे लोग

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जिले भर में पोला पाटन पर्व को लेकर देखा जा रहा उत्साह
मिट्टी, व लकड़ी के नंदी की लोगो ने की जमकर खरीदी
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पदमेश न्यूज़।बालाघाट।जिला मुख्यालय सहित अन्य तहसीलो व ग्रामीण अंचलों में पोला पाटन और नारबोद पर्व की तैयारियां शुरू हो गई है।जहां जिले भर में 10 सितंबर गुरुवार को पोला पाटन पर्व तो वही शुक्रवार को नारबोद पर्व मनाया जाएगा।प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने वाले इस पर्व को लेकर लोगो मे खासा उत्साह बना हुआ है।जहां छोटे बच्चे इस पर्व विशेष पर आनंदित नजर आ रहे है।उधर इन दोनों ही पर्व को लेकर बाजार एक बार फिर गुलज़ार हो चुका है जहां से लोग लकड़ी,व मिट्टी से बने नंदी, विभिन्न प्रकार के खिलौनों के साथ साथ नंदी को सजाने के लिए गुब्बारे, रंग, बेगड़ व अन्य साज सामग्री की खरीदी करते लोग नजर आ रहे है।वही दोनो ही पर्व पर बनने वाले पकवानों की सामग्रियो की जमकर खरीदी की जा रही है।बुधवार को स्थानीय बाजार में पर्व विशेष को लेकर सुबहा से देर शाम तक लोग विभिन्न सामग्रियो की खरीदी में जुटे रहे।आपको बताए कि नगर मुख्यालय में बूढ़ी, जयहिंद टॉकीज मैदान, भटेरा के आगे पोला पाटन पर्व पर नंदी पूजा का विशेष आयोजन किया जाएगा।

बैलों की होंगी विशेष पूजा, खिलाए जाएंगे पकवान
पोला पाटन पर्व एक तरह से कृषकों से जुड़ा है। इस दिन भगवान ‘नंदी’ के स्वरूप बैल की पूजा अर्चना कर विभिन्न पकवान बनाकर उन्हें खिलाया जाता है। ग्रामीण अंचलो में पोला पर्व के दिन ‘मवेशियों को रंग-बिरंगे रंगों से सजाकर आखर चौक में लाया जाएगा।जहा उनकी आरती उतारकर विशेष पूजा की जाएगी।कई जगहों पर तो आखर मैदान में बैल जोड़ी की दौड़ कराकर प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाएगा।वही बैल जोड़ी को घर ले जाकर अन्य लोग भी पूजा अर्चना करेंगे।वहीं उन्हें अपने हाथों से विभिन्न पकवान खिलाएंगे।

मवेशियों के सम्मान का प्रमुख पर्व है पोला
कृषि को अच्छा बनाने में मवेशियों का भी विशेष योगदान होता है। जिसके चलते किसान, पशु पालक मवेशियों की पूजा करते हैं। पोला का त्योहार उन्हीं में से एक है, इस दिन कृषक गाय, बैलों की पूजा करते हैं। किसान और अन्य लोग पशुओं की विशेष रूप से बैल की पूजा करते हैं, उन्हें अच्छे से सजाते हैं।बताया जा रहा है कि जिले के ज्यादातर किसान खेती के लिए बैलों का उपयोग करते है।इसलिए किसान पशुओं की पूजा आराधना एवं उनको धन्यवाद देने के लिए भी इस त्योहार को मनाते हैं।पोला के पहले दिन किसान अपने बैलों के गले एवं मुंह से रस्सी निकाल देते हैं। इसके बाद उन्हें हल्दी, बेसन का लेप लगाते हैं, तेल से उनकी मालिश की जाती है। इसके बाद उन्हें गर्म पानी से अच्छे से नहलाया जाता है या फिर समीप की नदी-नालो में ले जाकर नहलाया जाता है।इसके बाद उन्हें बाजरा से बनी खिचड़ी खिलाई जाती है। इसके बाद बैल को अच्छे से सजाया जाता है, उनकी सींग को कलर किया जाता है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य ये है कि बैलों के सींग में बंधी पुरानी रस्सी को बदलकर,नए तरीके से बांधा जाता है। गांव के सभी लोग एक जगह इक्कठे होते हैं और अपने-अपने पशुओं को सजाकर लाते हैं। इस दिन सबको अपने बैलों को दिखाने का मौका मिलता है।अनेक गांवों में इस दिन मेले भी लगाए जाते हैं, वही तरह-तरह की प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। कुल मिलाकर कहे तो पोला का यहा त्योहार हर इंसान को मवेशियों का सम्मान करना सिखाता है

बच्चो में दिख रहा खासा उत्साह
आज के युग में जहां बच्चे मोबाइल पर गेम एवं इलेक्ट्रानिक खिलौने खेलते हैं तो वहीं ग्रामीण अंचलों में लकड़ी के बैलों से बच्चे खेलते हैं। विशेष रूप से पोला पर्व पर इसका अलग ही महत्व है जब बच्चे चक्के लगे लकड़ी के बैलों में रस्सी बांधकर उसे लेकर दौड़ते हैं। पोला पर्व के दूसरे दिन तान्हा पोला मनाया जाता है जिसमें बच्चे लकड़ी के बैल लेकर दौड़ते हैं।गुरुवार को पोला पर्व धूमधाम से पूरे क्षेत्र में मनाया जाना है।जिसके लिए बाजार में जहां बैलों को सजाने के सामान की दुकाने विशेष रूप से लगी है वहीं एक से बढ़कर एक सामान बैलों को सजाने के लिए उपलब्ध है ताकि बैल रंग बिरंगे एवं आकर्षक नजर आए। इसी के साथ ही बाजार में बच्चों के लिए लकड़ी के बैलों की भी खूब बिक्री हो रही है।जिसे ख़रीदने के लिए बच्चे उत्साहित नजर आ रहे है। नगर बाजार में मिट्टी व लकड़ी के नन्दी 50 रु लेकर 250 रुपए की दर पर बिकने आए हुए हैं।

लागत निकलना भी मुश्किल है –
पोला पाटन पर्व को लेकर की गई चर्चा के दौरान दुकानदारो ने बताया कि वे कुम्हार है जो मिट्टी से विभिन्न प्रकार की सामग्रियां बनाते हैं.इस वर्ष पाटन पोला का पर्व गुरुवार को मनाया जाना है जिसको लेकर गुजरी परिसर में पाटन पोला पर्व पर बिकने वाली सामग्रियों की दुकान लगाई गई है. जिसमें मिट्टी के खिलौने और मिट्टी से बने नंदी का समावेश है.उन्होंने बताया कि मिट्टी से बने नंदी की पूजा होती है जबकी लकड़ी से बने नंदी की पूजा नहीं की जाती, वह सिर्फ बच्चों के खेलने के काम आते हैं. उन्होंने बताया कि कुम्हारी व्यवसाय में अब ज्यादा इनकम नहीं होती, क्योंकि अब मिट्टी भी खरीदना पड़ता है,मिट्टी लाने के लिए किराया लगता है, उसे बनाने, तैयार करने बाद विभिन्न रंग रोगन से सजाना और किराया लगाकर उसे बाजार तक उपलब्ध कराना यह काफी महंगा हो चुका है. ग्राहक पुराने रेट में ही मिट्टी के सामान, खिलौने व नंदी की मांग करते हैं ऐसे में हमारी लागत भी निकालना मुश्किल हो जाता है और लागत भी नहीं निकल पाती.

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