नीमच: करीब 1800 साल पहले ‘मालव’ समुदाय के एक प्राचीन शिल्पकार ने मां सरस्वती को एक विशिष्ट, धनुषाकार और हरप जैसी दिखने वाली वीणा सौंपी थी। आज वही छोटी सी ब्लैक सैंडस्टोन की मूर्ति प्राचीन भारतीय संगीत और सांस्कृतिक इतिहास का एक जीवंत दस्तावेज बन चुकी है। यह दुर्लभ कलाकृति मध्य प्रदेश के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ रही है।
क्या है कैटलॉग नंबर 78 का राज
यह 30 x 27 x 8 सेंटीमीटर आकार की मूर्ति 1980 के दशक में नीमच जिले के मनासा कस्बे से मिली थी, जो पिछले कई दशकों से उज्जैन संग्रहालय में धूल फांक रही थी। संग्रहालय में इसे बेहद सामान्य रूप से केवल कैटलॉग नंबर ’78’ के रूप में दर्ज किया गया था। हाल ही में जब पुरातत्व आयुक्त मदन कुमार ने संग्रहालय का दौरा किया और क्यूरेटर योगेश पाल ने इस पर उनका ध्यान आकर्षित किया, तब इस मूर्ति का वास्तविकऐतिहासिक महत्व उजागर हुआ।इसके बाद पुरातत्व विभाग ने मध्य प्रदेश के संग्रहालयों में मौजूद सरस्वती की मूर्तियों का एक व्यापक और गहन आइकॉनोग्राफिक सर्वे किया। मुद्राओं, आभूषणों और वाद्ययंत्रों की तुलना करने के बाद यह निष्कर्ष निकला कि यह मूर्ति दूसरी शताब्दी के मालव काल की है। यह मध्य प्रदेश में अब तक मिली वाद्ययंत्र के साथ देवी सरस्वती की सबसे प्राचीन मूर्ति है।
सिकंदर के इतिहास से जुड़ा मालव समुदाय
वरिष्ठ पुरातत्वविद् डॉ. रमेश यादव बताते हैं कि रोमन इतिहासकार क्विंटस कुर्टियस रुफस ने अपनी पुस्तक ‘हिस्टोरिया एलेक्झांड्री मैग्नी’ में मैसेडोनियन सम्राट अलेक्जेंडर (सिकंदर) को मालव समुदाय से मिले भीषण प्रतिरोध का जिक्र किया है। भारतीय परंपरा के अनुसार, मालव कमांडर सिंघरन उस युद्ध से जुड़े थे जिसमें सिकंदर गंभीर रूप से घायल हुआ था। इसके बाद मालव समुदाय दक्षिण की ओर मंदसौर क्षेत्र की तरफ बढ़ा और यह मूर्ति उसी काल की सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करती है।इसके बाद पुरातत्व विभाग ने मध्य प्रदेश के संग्रहालयों में मौजूद सरस्वती की मूर्तियों का एक व्यापक और गहन आइकॉनोग्राफिक सर्वे किया। मुद्राओं, आभूषणों और वाद्ययंत्रों की तुलना करने के बाद यह निष्कर्ष निकला कि यह मूर्ति दूसरी शताब्दी के मालव काल की है। यह मध्य प्रदेश में अब तक मिली वाद्ययंत्र के साथ देवी सरस्वती की सबसे प्राचीन मूर्ति है।
सिकंदर के इतिहास से जुड़ा मालव समुदाय
वरिष्ठ पुरातत्वविद् डॉ. रमेश यादव बताते हैं कि रोमन इतिहासकार क्विंटस कुर्टियस रुफस ने अपनी पुस्तक ‘हिस्टोरिया एलेक्झांड्री मैग्नी’ में मैसेडोनियन सम्राट अलेक्जेंडर (सिकंदर) को मालव समुदाय से मिले भीषण प्रतिरोध का जिक्र किया है। भारतीय परंपरा के अनुसार, मालव कमांडर सिंघरन उस युद्ध से जुड़े थे जिसमें सिकंदर गंभीर रूप से घायल हुआ था। इसके बाद मालव समुदाय दक्षिण की ओर मंदसौर क्षेत्र की तरफ बढ़ा और यह मूर्ति उसी काल की सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करती है।










































