क्रिकेट में कुछ बल्लेबाज ऐसे होते हैं जो मैदान पर आते ही माहौल बदल देते हैं। उनकी बल्लेबाजी में आक्रामकता होती है, बड़े शॉट होते हैं और हर रन के साथ दर्शकों की आवाज जुड़ी होती है। लेकिन ध्रुव जुरैल की कहानी कुछ अलग है। वह रन बनाते हैं, लेकिन ऐसा लगता है जैसे रन खुद उनके पास चले आए हों।
स्पोर्ट्स डेस्क, नई दिल्ली। ‘कहते हैं कि नाम नहीं, आपका काम आपकी पहचान बनाता है।’ ध्रुव जुरैल पर बात सही ठहरती है। वह शोर से दूर बिना किसी आकर्षण के अपने बल्ले से अपनी कहानी लिख रहे हैं। श्रीलंका के खिलाफ दूसरे टेस्ट में जुरैल की बल्लेबाजी ने एक बार फिर यही तस्वीर पेश की। उनकी बल्लेबाजी में दिखावा नहीं था, लेकिन उसके पीछे एक खास तरह की शांति और भरोसा जरूर था।
उन्होंने चुपके से दो टेस्ट मैच की सीरीज में अब तक दो मैच की तीन पारियों में 173 ऐसे रन बनाए हैं, जिनमें चमक-दमक कम और नियंत्रण ज्यादा नजर आता है। वह इस सीरीज में तीसरे सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज हैं। यूपी के इस विकेटकीपर बल्लेबाज की 86.50 की औसत और 66.54 की स्ट्राइक रेट से बल्लेबाजी की है।
पुराने जमाने की बल्लेबाजी की झलक
जुरैल की बल्लेबाजी को देखकर कभी-कभी लगता है कि वह आधुनिक क्रिकेट की जल्दबाजी से थोड़ा दूर खड़े हैं। न गेंद को बेवजह पीटने की कोशिश, न हर डिलीवरी पर बड़ा शॉट खेलने की बेचैनी। गेंद जहां है, उसी के हिसाब से शॉट चयन, यही उनकी बल्लेबाजी की सबसे खास खूबी है। उनके शॉट्स में एक तरह की सादगी होती है।सीधा बल्ला, गेंद की अच्छी परख और जोखिम से बचने की समझ। शायद यही वजह है कि उनकी पारियां खत्म होने तक स्कोरबोर्ड पर रन काफी हो जाते हैं, लेकिन दर्शकों को याद नहीं रहता कि वे रन कब और कैसे आ गए। यही तो ‘Unobtrusive Runs’ यानी बिना शोर किए रन बनाने की कला है।
पंत के साए में बनाई अपनी पहचान
ध्रुव जुरैल का भारतीय टेस्ट क्रिकेट में उदय तब हुआ जब ऋषभ पंत वर्ल्ड के बेस्ट विकेटकीपर बल्लेबाज बनने के बेहद करीब थे। हालांकि, वह चोटिल होते हैं और जुरैल को मौका मिलता है और अब वह बतौर स्पेशलिस्ट बल्लेबाज की भूमिका में आ गए हैं। पंत की बल्लेबाजी विस्फोटक है। वह गेंदबाज के दिमाग में डर पैदा करते हैं और एक ही ओवर में मैच का रंग बदल सकते हैं। हालांकि, वह नया करने के चक्कर में टेस्ट क्रिकेट में तीन बार गंभीर रूप से चोटिल हो चुके हैं, जिसका फायदा ध्रुव जुरैल को मिलाध्रुव जुरैल, पंत से विपरीत धैर्य के साथ खेलते हैं। वह गेंदबाज को परेशान करने के बजाय परिस्थितियों को समझते हैं। विकेट की प्रकृति, गेंद की गति और फील्ड की स्थिति को पढ़कर अपने शॉट चुनते हैं। यही वजह है कि दोनों की तुलना करने के बजाय जुरैल को उनकी अपनी शैली में देखना ज्यादा दिलचस्प है। जुरैल की बल्लेबाजी का सबसे आकर्षक पहलू उनका नियंत्रण है। शतकीय पारी के दौरान उनका नियंत्रण का प्रतिशत 91% तक रहा है। यानी जोखिम भरे शॉट्स के बजाय वह गेंद को अपने हिसाब से खेलने पर ज्यादा भरोसा करते हैं।
टेस्ट क्रिकेट में यह गुण बेहद महत्वपूर्ण है। क्योंकि पांच दिन के खेल में हर गेंद पर जीत हासिल करने की कोशिश नहीं की जाती। कई बार आपको सिर्फ यह पता होना चाहिए कि कौन-सी गेंद छोड़नी है, किसे सम्मान देना है और किसे सीमा रेखा तक पहुंचाना है। जुरैल इसी गणित को समझते हुए आगे बढ़ते दिखाई देते हैं।
शांत पानी सी गहराई
ध्रुव जुरैल की बल्लेबाजी शायद ऐसी है जैसे शांत पानी। ऊपर से सब कुछ सहज और सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर काफी गहराई है। वह अपनी बल्लेबाजी को सुर्खियों में लाने के लिए नहीं खेलते। उनका काम रन बनाना है और वह उसे बिना अतिरिक्त शोर के करते हैं। यही खूबी उन्हें भारतीय टेस्ट टीम के लिए खास बनाती है।









































