MP High Court News: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें बच्ची की नानी को भरण पोषण देने से मना कर दिया था। बच्ची की मां नहीं है और वह नानी के साथ रहती है। हाईकोर्ट ने उसकी देखभाल के लिए पिता को भरण-पोषण देने के लिए कहा है।उज्जैन: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जबलपुर फैमिली कोर्ट से उस आदेश को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है, जिसमें नाबालिग बच्ची को अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा कि बच्ची की नानी, उसके पिता से भरण-पोषण की मांग कर सकती हैं, भले ही पिता बच्ची और उसकी मां से अलग रह रहे हों।
मां की मौत के बाद नानी के साथ रहती बच्ची
2015 में जन्मी यह बच्ची 2018 में अपनी मां की बीमारी से मौत के बाद से अपनी नानी के साथ रह रही थी। तब तक उसके माता-पिता अलग हो चुके थे। नानी के वकील ने हाईकोर्ट को बताया कि बच्ची के पिता ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया था।
नानी के पास आर्थिक साधन नहीं
नानी के पास बच्ची की परवरिश के लिए पर्याप्त आर्थिक साधन नहीं थे, इसलिए उन्होंने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत बच्ची के पिता से भरण-पोषण की मांग करते हुए एक अर्जी दाखिल की। बाद में, उन्होंने मुख्य अर्जी पर फैसला आने तक अंतिम भरण-पोषण की भी मांग की। पिता ने पैसे देने से इनकार कर दिया और कहा कि उसे यकीन नहीं है कि बच्ची उसी की है।फैमिली कोर्ट खारिज कर दी थी याचिका
दरअसल, 2022 में फैमिली कोर्ट ने इस अंतरिम अर्जी को खारिज कर दिया था। कोर्ट का तर्क था कि नानी को कानूनी रूप से बच्ची का अभिभावक नियुक्त नहीं किया गया है। कोर्ट ने कहा कि जब तक वह कानूनी कस्टडी के लिए आवेदन नहीं करतीं और उन्हें यह कस्टडी मिल नहीं जाती, तब तक उन्हें बच्ची की ओर से कानूनी कार्यवाही शुरू करने का कोई अधिकार नहीं है।
नानी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया
उसी साल नानी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनकी रिवीजन याचिका को स्वीकार करते हुए, जस्टिस डीडी बंसल ने 13 अक्टूबर के अपने आदेश में कहा कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि बच्ची, उस व्यक्ति की ही संतान है। नानी ने बताया था कि मां की मौत के बाद से बच्ची उनकी देखरेख में है और पिता ने अपने जवाब में इस बात से इनकार भी नहीं किया।
सीआरपीसी की धारा 125 के प्रावधानों की व्याख्या इस तरह की जानी चाहिए, जिससे सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिले और असहाय लोगों को इसका लाभ मिल सके।
हाईकोर्ट
फैमिली कोर्ट समझने में विफल रहा
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट इस बात को समझने में विफल रहा कि यहां अधिकारों को लागू करना और उस नाबालिग बच्ची के लिए जरूरी है, न कि उनसकी नानी के लिए।
क्या आपको लगता है कि नानी को बच्ची के भरण-पोषण के लिए कानूनी अधिकार मिलने चाहिए? इस विषय पर अपने विचार कमेंट में लिखें।










































