NRI Dollar Deposit Schemes: क्या NRI से डॉलर जुटाएगा भारत? पिछले संकट के दौरान कैसे किया था इंतजाम

0

NRI Dollar Deposit Schemes : भारत के चालू वित्त वर्ष FY27 में भुगतान संतुलन (Balance of Payments- BoP) लगातार तीसरे साल घाटे में रहने की आशंका जताई जा रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और निर्यात में अपेक्षित तेजी न आना है। ईरान-अमेरिका तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं। इससे भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ रहा है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि चालू खाता घाटा (CAD) FY26 के 1% से बढ़कर FY27 में 2% से अधिक हो सकता है। इसके अलावा, पिछले एक साल से विदेशी पूंजी निवेश का प्रवाह भी कमजोर रहा है। ऐसे में देश का भुगतान संतुलन करीब 68-70 अरब डॉलर के घाटे में जा सकता है। हालांकि भारत के पास करीब 700 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, फिर भी सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भारतीय प्रवासियों यानी एनआरआई से डॉलर जुटाने के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।

1998 में क्यों लाए गए थे ‘रिसर्जेंट इंडिया बॉन्ड’

साल 1997 में एशियाई वित्तीय संकट ने कई एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया था। इसी दौरान भारत ने मई 1998 में परमाणु परीक्षण किया, जिसके बाद अमेरिका समेत कई देशों ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ने लगा। इस संकट से निपटने के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने अगस्त 1998 में रिसर्जेंट इंडिया बॉन्ड (RIB) जारी किए। ये बॉन्ड खासतौर पर एनआरआई और विदेशी कॉरपोरेट संस्थाओं के लिए थे। इनकी अवधि पांच साल थी। बॉन्ड डॉलर, पाउंड स्टर्लिंग और जर्मन मुद्रा डॉएचे मार्क में जारी किए गए थे। इन पर आकर्षक ब्याज दर दी गई थी। डॉलर बॉन्ड पर 7.75%, पाउंड पर 8% और डॉएचे मार्क पर 6.25% ब्याज मिलता था। साथ ही इन निवेशों पर भारत में टैक्स छूट भी दी गई थी। इस योजना को जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली और केवल तीन हफ्तों में 4.23 अरब डॉलर जुटा लिए गए।

2000 में शुरू हुई ‘इंडिया मिलेनियम डिपॉजिट’ योजना

साल 2000 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ गया। अप्रैल से अक्टूबर 2000 के बीच RBI के विदेशी मुद्रा भंडार में करीब 3 अरब डॉलर की कमी आई। इसके बाद SBI ने इंडिया मिलेनियम डिपॉजिट (IMD) योजना शुरू की। यह भी पांच साल की योजना थी और इसे एनआरआई निवेशकों के लिए लाया गया था। इसमें डॉलर, पाउंड और यूरो में निवेश की सुविधा दी गई। डॉलर पर 8.5%, पाउंड पर 7.85% और यूरो पर 6.85% ब्याज तय किया गया। इस योजना के जरिए भारत ने करीब 5.5 अरब डॉलर जुटाए। सरकार ने निवेशकों को टैक्स लाभ भी दिया और विदेशी मुद्रा जोखिम का बड़ा हिस्सा खुद उठाने का भरोसा दिया। जुटाई गई रकम का इस्तेमाल इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और सरकारी प्रतिभूतियों में किया गया। हालांकि योजना पूरी होने पर करीब 7 अरब डॉलर लौटाने पड़े।2013 में FCNR(B) योजना से आए 34 अरब डॉलर

साल 2013 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा मौद्रिक नीति में बदलाव के संकेत देने से उभरते बाजारों से पूंजी निकलने लगी। इसे टेपेर टैंट्रम कहा गया। भारत से भी विदेशी निवेश तेजी से बाहर गया और रुपया कमजोर हो गया। स्थिति संभालने के लिए RBI ने बैंकों को विशेष सुविधा दी। बैंकों को एनआरआई से जुटाए गए FCNR(B) जमा को सस्ती दर पर रुपये में बदलने की अनुमति मिली। इससे बैंक एनआरआई को ज्यादा ब्याज दे पाए। इस योजना और दूसरी स्वैप सुविधा के जरिए भारत ने करीब 34 अरब डॉलर जुटाए, जिनमें 26 अरब डॉलर केवल FCNR(B) योजना से आए। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें वास्तविक एनआरआई निवेश कम था और विदेशी बैंकों का पैसा ज्यादा शामिल था। साथ ही RBI को सस्ती स्वैप सुविधा देने के कारण देश को छिपी हुई बड़ी लागत भी उठानी पड़ी।

अब सरकार किन विकल्पों पर विचार कर रही है

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकार और RBI फिर से FCNR(B) या IMD जैसी योजनाओं पर विचार कर रहे हैं। लेकिन इस बार स्थिति 2013 से अलग है। उस समय अमेरिका में ब्याज दरें बहुत कम थीं, जबकि आज 10 साल के अमेरिकी बॉन्ड पर 4.5% से ज्यादा रिटर्न मिल रहा है। ऐसे में भारत को एनआरआई निवेश आकर्षित करने के लिए ज्यादा ब्याज देना पड़ सकता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर सरकार बड़ी मात्रा में डॉलर जुटाना चाहती है, तो RBI को बैंकों को विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाने के लिए विशेष स्वैप सुविधा देनी होगी। तभी बैंक एनआरआई निवेशकों को आकर्षक रिटर्न दे पाएंगे और भारत को विदेशी मुद्रा का पर्याप्त प्रवाह मिल सकेगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here