रियाद: अमेरिका और सऊदी अरब ने 30 साल के न्यूक्लियर समझौते पर साइन किए हैं। इस समझौते के तहत अमेरिका सऊदी अरब को सिविलियन न्यूक्लियर प्रोग्राम विकसित करने में मदद करेगा। इस समझौते पर अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और सऊदी ऊर्जा मंत्री अब्दुलअजीज बिन सलमान ने हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता एटॉमिक एनर्जी एक्ट की धारा 123 के तहत किया गया है, जो अमेरिकी कंपनियों को विदेश में न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने की इजाजत देता है। हालांकि, सऊदी अरब इकलौता खाड़ी देश नहीं है, जो न्यूक्लियर प्रोग्राम चला रहा है। जानें मध्य पूर्व के कौन से देश एटमी पावर बनने की होड़ में हैं।
ईरान
ईरान का परमाणु कार्यक्रम 1950 के दशक में शुरू हुआ था। वर्तमान में यह कार्यक्रम यूरेनियम संवर्धन, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, अमेरिका और इजरायल के हमलों के साथ कूटनीतिक व सैन्य तनाव के कारण गंभीर वैश्विक चिंता का विषय बना हुआ है। खास बात यह है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम अमेरिका और पश्चिमी देशों के सहयोग से शुरू हुआ था, जो आज उन्हीं के निशाने पर है। इस्लामिक क्रांति के बाद इसे कुछ समय के लिए रोक दिया गया, लेकिन 1980 के दशक के अंत में इसे फिर से शुरू किया गया। इसमें रूस ने ईरान की मदद की। ईरान ने रूस की मदद से बुशहर में परमाणु ऊर्जा संयंत्र का निर्माण किया। कई रिपोर्टों के अनुसार, ईरान ने 60% से अधिक स्तर तक यूरेनियम का संवर्धन किया है, जो हथियार-ग्रेड स्तर (90%) के काफी करीब है।
इजरायल
इजरायल मध्य पूर्व का इकलौता परमाणु हथियार संपन्न देश है। हालांकि, इजरायल ने इसे न तो स्वीकार किया है और ना ही खारिज किया है। इस मामले में उसकी नीति बहुत ही गोपनीय है। यह देश NPT (परमाणु अप्रसार संधि) का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, इसलिए IAEA उसकी क्षमताओं का आकलन नहीं कर सकता। 1980 के दशक से ही इजरायल ने यूएन एजेंसी को जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया है। ‘न्यूक्लियर थ्रेट इनिशिएटिव’ (NTI) थिंक टैंक के अनुसार, इजरायल के पास 1960 के दशक से परमाणु हथियार हैं और उसके पास लगभग 90 परमाणु वॉरहेड हैं। NTI का कहना है कि इज़राइल के पास इतना यूरेनियम और प्लूटोनियम का भंडार है कि वह 300 और परमाणु हथियार बना सकता है। इजरायल का सबसे महत्वपूर्ण परमाणु केंद्र दक्षिणी शहर डिमोना के पास शिमोन पेरेस नेगेव न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर है। यह केंद्र 1957 में फ्रांस की मदद से बनाया गया था। ऐसी अटकलें हैं कि इजरायल ने 1979 में रंगभेद के दौर वाले दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर अपने हथियारों का परीक्षण किया था।
संयुक्त अरब अमीरात (UAE)
संयुक्त अरब अमीरात ने 2009 में अमेरिका के साथ 123 समझौता करके अपना पूरी तरह से नागरिक परमाणु कार्यक्रम शुरू किया था। इसमें देश ने कहा कि वह घरेलू स्तर पर यूरेनियम संवर्धन या इस्तेमाल हो चुके ईंधन की रीप्रोसेसिंग नहीं करेगा। यूएई परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर करने वाला देश भी है। यूएई का प्रमुख परमाणु बुनियादी ढांचा बराकाह परमाणु ऊर्जा संयंत्र है। इसमें दक्षिण कोरिया द्वारा डिज़ाइन किए गए चार रिएक्टर हैं जो अमेरिकी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। बराकाह से लगभग 5,600 मेगावाट बिजली पैदा होती है, जो UAE की कुल मांग का लगभग एक चौथाई हिस्सा है। IAEA को इस जगह तक पूरी पहुंच हासिल है और वह रियल-टाइम कैमरों के ज़रिए वहां की गतिविधियों पर नजर रख सकता है।
तुर्की
तुर्की का परमाणु कार्यक्रम मुख्य रूप से ऊर्जा सुरक्षा और बढ़ती बिजली की मांग को पूरा करने पर केंद्रित है। इसके लिए तुर्की अक्कूयु परमाणु ऊर्जा संयंत्र का निर्माण कर रहा है। इस संयंत्र को रूस ने डिजाइन किया है और वही इसकी मेंटीनेंस करता है। तुर्की के पास वर्तमान में कोई परमाणु रिएक्टर चालू नहीं है, लेकिन उसने 2050 तक 20 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। तुर्की भी NPT पर हस्ताक्षर करने वाला देश है। समझौते के तहत, तुर्की को रिएक्टरों से निकलने वाले इस्तेमाल हो चुके ईंधन तक पहुंच नहीं मिलती है, जिसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने के लिए किया जा सकता है।
मिस्र
मिस्र का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से शांतिपूर्ण नागरिक उद्देश्यों के लिए है। इसका मुख्य केंद्र अल-डाबा परमाणु ऊर्जा संयंत्र का निर्माण और अनुसंधान रिएक्टरों का संचालन है। इस संयंत्र को रूस ने डिजाइन किया है और वही उसका निर्माण भी कर रहा है। इस संयंत्र से 4,800 मेगावाट तक बिजली पैदा हो सकती है। तुर्की की तरह, मिस्र के इस्तेमाल हो चुके न्यूक्लियर फ्यूल की निगरानी भी रूस करता है। मिस्र के पास मेडिकल रिसर्च के लिए आइसोटोप बनाने वाले रिसर्च रिएक्टर भी हैं। मिस्र NPT पर हस्ताक्षर करने वाले देश है। मिस्र का नागरिक परमाणु कार्यक्रम बिजली और समुद्री पानी को मीठा बनाने के लिए पूरी तरह समर्पित है।
इराक
1970 के दशक में राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के दौर में इराक ने चुपके से न्यूक्लियर हथियार बनाने की कोशिश की थी। इसके लिए इराक ने फ्रांस से ओसिराक रिएक्टर खरीदा और उसे बगदाद के पास तुवैथा न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर में स्थापित किया था। 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान ईरान ने इस रिएक्टर पर हमला किया, जबकि एक साल बाद इजरायल ने इस पर बमबारी की। 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान अमेरिका ने भी इस जगह पर हमला किया था। 2003 में अमेरिका के नेतृत्व में इराक पर हमले के बाद, IAEA ने पुष्टि की कि इराक का न्यूक्लियर प्रोग्राम खत्म कर दिया गया है। हालांकि, हाल के समय में इराक ने न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने के लिए चीन और रूस के साथ साझेदारी करने की कोशिश की है।









































