BrahMos Missile 25 Years : आज ब्रह्मोस मिसाइल सिर्फ भारत की ताकत का प्रतीक नहीं है, बल्कि इसे देश के सबसे सफल डिफेंस प्रोजेक्ट्स में गिना जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसकी शुरुआत किसी बड़े सरकारी दफ्तर से नहीं, बल्कि दक्षिण दिल्ली के वसंत विहार में एक किराये के मकान से हुई थी। उस इमारत पर कोई नाम नहीं था, कर्मचारियों को नियुक्ति पत्र नहीं दिए गए थे और भर्ती के विज्ञापन भी एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के नाम पर निकाले जाते थे। आज, 25 साल बाद, यही ब्रह्मोस भारत की तीनों सेनाओं की बड़ी ताकत बन चुकी है। इसकी सफलता ने भारत को रक्षा निर्यात के क्षेत्र में भी नई पहचान दिलाई है।
गल्फ युद्ध ने बदली भारत की सोच
ब्रह्मोस की कहानी 1991 के खाड़ी युद्ध से जुड़ी है। उस समय अमेरिका ने इराक पर टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया था। उस युद्ध का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिक डॉ. ए. शिवथानु पिल्लई ने महसूस किया कि भविष्य के युद्धों में लंबी दूरी से बेहद सटीक हमला करने वाली क्रूज मिसाइलें निर्णायक भूमिका निभाएंगी। उन्होंने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से इस बारे में चर्चा की। कलाम ने इस विचार को आगे बढ़ाने के लिए कहा और यहीं से भारत के अपने सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल कार्यक्रम की नींव रखी गई।
रूस के साथ साझेदारी से मिला बड़ा मोड़
भारत के पास उस समय सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की तकनीक नहीं थी। इसके बाद रूस के साथ बातचीत शुरू हुई। दोनों देशों ने मिलकर एक ऐसी मिसाइल विकसित करने का फैसला किया, जो जमीन और समुद्र से दागी जा सके। साल 1998 में भारत और रूस के बीच समझौता हुआ। दोनों देशों ने करीब 25 करोड़ डॉलर का संयुक्त निवेश किया और ब्रह्मोस एयरोस्पेस की स्थापना हुई। भारत की हिस्सेदारी 50.5 प्रतिशत और रूस की 49.5 प्रतिशत रखी गई। मिसाइल का नाम भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मॉस्कवा नदी के नाम को जोड़कर ब्रह्मोस रखा गया।
300 किलोमीटर की सीमा क्यों रखनी पड़ी?
शुरुआत में ब्रह्मोस की मारक क्षमता केवल 290 किलोमीटर रखी गई। उस समय मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम के नियमों के कारण रूस 300 किलोमीटर से अधिक दूरी वाली मिसाइल विकसित करने में भारत की मदद नहीं कर सकता था। बाद में 2016 में भारत इस समूह का सदस्य बना। इसके बाद वैज्ञानिकों ने लंबी दूरी वाली नई ब्रह्मोस विकसित की। अब इसके ऐसे संस्करण मौजूद हैं जो 450 से 500 किलोमीटर तक निशाना साध सकते हैं। 800 किलोमीटर से अधिक दूरी वाली क्षमता पर भी काम आगे बढ़ चुका है।
पहला परीक्षण और दुनिया को चौंकाने वाली रफ्तार
12 जून, 2001 को ओडिशा से ब्रह्मोस का पहला सफल परीक्षण किया गया। इसके बाद 2005 में भारतीय नौसेना के युद्धपोत से छोड़ी गई ब्रह्मोस ने समुद्र में मौजूद लक्ष्य को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया। करीब मैक 2.8 की गति से उड़ने वाली यह मिसाइल आवाज की रफ्तार से लगभग तीन गुना तेज चलती है। इसकी यही गति दुश्मन की वायु रक्षा प्रणाली के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानी जाती है।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद दुनिया में बनी धाक
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस का इस्तेमाल होने के बाद इसकी चर्चा पूरी दुनिया में हुई। तमाम रिपोर्टों में कहा गया है कि पाकिस्तान के कई अहम सैन्य ठिकानों पर तेज और सटीक हमलों ने इस मिसाइल की क्षमता को वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया। पाकिस्तान के नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से माना कि मिसाइल की गति के कारण जवाब देने के लिए बेहद कम समय मिला। यही वह क्षण था, जिसके बाद कई देशों की दिलचस्पी ब्रह्मोस में और बढ़ गई।
भारत की सबसे सफल रक्षा निर्यात कहानी
जनवरी 2022 में फिलीपींस ब्रह्मोस खरीदने वाला पहला विदेशी देश बना। इसके बाद वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ भी समझौते हुए। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और मिस्र जैसे देशों ने भी इसमें रुचि दिखाई है। भारत अब “मेक इन इंडिया” से आगे बढ़कर “मेक फॉर द वर्ल्ड” की रणनीति पर काम कर रहा है और ब्रह्मोस इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन चुकी है।
लखनऊ बना ब्रह्मोस का नया केंद्र
उत्तर प्रदेश रक्षा औद्योगिक गलियारे के तहत लखनऊ में 200 एकड़ में अत्याधुनिक एकीकरण और परीक्षण केंद्र बनाया गया है। यहीं मिसाइलों की असेंबली, परीक्षण और एकीकरण किया जाता है। इस संयंत्र की वार्षिक क्षमता लगभग 100 मिसाइल प्रणाली तैयार करने की बताई गई है। इससे हजारों लोगों को रोजगार मिलने के साथ भारत के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को भी बड़ा बल मिला है।
अब लक्ष्य हाइपरसोनिक तकनीक
भारत अब ब्रह्मोस के अगले चरण पर काम कर रहा है। वैज्ञानिक ऐसी हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, जिसकी गति मैक 6 या उससे भी अधिक हो सकती है। यदि यह परियोजना सफल होती है तो भारत दुनिया के चुनिंदा देशों में शामिल होगा, जिनके पास ऐसी अत्याधुनिक तकनीक होगी।










































