छत्तीसगढ़ का नाम कैसे पड़ा? स्थापना दिवस पर जानें भोरमदेव से दंतेश्वरी मंदिर तक, पाण्डुवंश से कलचुरी वंश तक की कहानी

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Chhattisgarh Sthapna Diwas: 1 नवंबर मध्य प्रदेश के साथ छत्तीसगढ़ का भी स्थापना दिवस है। इस राज्य में ऐतिहासिक धरोहरों और आधुनिक विकास का अनूठा संगम है। इस राज्य ने दक्षिण कोसल, महाकांतार और दण्डकारण्य के पौराणिक आंचल से जुड़े इस भूभाग ने पाण्डुवंश, नलवंश और कलचुरी राजवंशों का शासन देखा है।रायपुर: छत्तीसगढ़ की पहचान केवल धान के कटोरे, घने जंगलों और खनिज संपदा से नहीं है। इसकी मिट्टी में इतिहास की अनगिनत कहानियां दफन हैं। इस राज्य ने राजाओं के उत्थान और साम्राज्यों के पतन देखे हैं। छत्तीसगढ़ के इस आत्मीय उद्गार में राज्य का वह गौरवशाली अतीत छिपा है, जो सदियों से भारतीय संस्कृति और सभ्यता का अहम हिस्सा रहा है। आज जब प्रदेश अपना स्थापना दिवस मना रहा है, तो इसके इतिहास, संघर्ष और सांस्कृतिक वैभव की थाह लेना बेहद प्रासंगिक हो जाता है। प्राचीन दक्षिण कोसल से लेकर आधुनिक भारत के एक महत्वपूर्ण ऊर्जावान राज्य बनने तक की यह यात्रा विरासत, वीरता और विकास की एक अनूठी गाथा है। आइए जानते हैं उस छत्तीसगढ़ के बारे में, जिसके कण-कण में इतिहास की खुशबू रची-बसी है।

36 गढ़ों से बनी छत्तीसगढ़ की पहचान

छत्तीसगढ़ नाम के पीछे इतिहास की एक बेहद दिलचस्प कहानी जुड़ी है। माना जाता है कि इस क्षेत्र में 36 किले या गढ़ होने के कारण इसका नाम ‘छत्तीसगढ़’ पड़ा। रायपुर जिले के 1973 के गजेटियर में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि इनमें से 18 गढ़ शिवनाथ नदी के उत्तर और 18 दक्षिण दिशा में स्थित थे। इसके अलावा, एक अन्य मत यह भी है कि यह शब्द ‘चेदिशगढ़’ का अपभ्रंश है, क्योंकि यह क्षेत्र लंबे समय तक चेदि राजवंश के अधीन रहा था।

पौराणिक रूप से समृद्ध है छत्तीसगढ़

इतिहास के पन्नों को पलटें तो वर्तमान छत्तीसगढ़ का यह भूभाग प्राचीन दक्षिण कोसल, महाकांतार और दण्डकारण्य जैसे क्षेत्रों से जुड़ा रहा है। बस्तर का घना वन क्षेत्र प्राचीन महाकांतार का मुख्य हिस्सा रहा है। इस धरती ने राजर्षितुल्य, शरभपुरीय, पाण्डुवंश, नलवंश, छिंदक नागवंश, फणीनागवंश, सोमवंश और कलचुरी वंश जैसे कई महान राजवंशों का शासन देखा है। आज भी भोरमदेव मंदिर , रतनपुर का महामाया मंदिर, दंतेश्वरी और बम्लेश्वरी मंदिर इस स्थापत्य कला और समृद्ध अतीत की गवाही देते हैं।

संघर्ष और बलिदान की माटी

मध्यकाल के बाद मराठा शासन और फिर अंग्रेजों के नियंत्रण वाले दौर में भी छत्तीसगढ़ की जनता ने विदेशी हुकूमत के सामने कभी सिर नहीं झुकाया। 1857 की प्रथम स्वतंत्रता क्रांति के दौरान सोनाखान के वीर नारायण सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध हुंकार भरी और अपने अदम्य साहस व बलिदान से इतिहास के पन्नों में अमर हो गए। यहां के आदिवासी आंदोलनों ने भी अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाकर स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा और धार दी।

1 नवंबर 2000: एक नए राज्य का उदय

सदियों के इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सफर के बाद 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के तहत छत्तीसगढ़ एक नए और स्वतंत्र राज्य के रूप में मानचित्र पर उभरा। रायपुर को इसकी राजधानी बनाया गया और बाद में नवा रायपुर (अटल नगर) को एक आधुनिक प्रशासनिक व तकनीक हब के रूप में विकसित किया गया। राज्य बनने के बाद से ही इसकी क्षेत्रीय पहचान को नई मजबूती मिली और विकास के नए रास्ते खुले।

खनिज संपदा से लेकर औद्योगिक शक्ति तक

प्रकृति ने छत्तीसगढ़ को बेहिसाब खनिजों से नवाजा है। लौह अयस्क, कोयला, बॉक्साइट, डोलोमाइट और टिन के विशाल भंडारों ने इसे देश के औद्योगिक मानचित्र पर एक विशिष्ट स्थान दिलाया है। भिलाई इस्पात संयंत्र इसकी औद्योगिक क्षमता का सबसे बड़ा प्रतीक है। इसके अलावा, कोरबा, रायगढ़, बिलासपुर और जांजगीर-चांपा जैसे जिले देश को ऊर्जा देने में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।

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