Mutual Fund निवेशकों के लिए अच्छी खबर, 1 नवंबर से बदलेगा प्लान चुनने का तरीका, जानें क्या?

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अगर आप सिप के जरिये म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं या करने की तैयारी में हैं तो आपके लिए अच्छी खबर है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ‘डायरेक्ट म्यूचुअल फंड प्लान’ डिफॉल्ट विकल्प मिलेगा।देशभर के करोड़ों म्यूचुअल फंड निवेशकों के लिए अच्छी खबर है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने उनके हित में बड़ा फैसला लिया है। इसकी जानकारी खुद सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने दी है। उन्होंने बताया है कि अगले महीने की पहली तारीख यानी 1 नवंबर से एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ‘डायरेक्ट म्यूचुअल फंड प्लान’ डिफॉल्ट विकल्प होगा। इससे निवेशकों को काफी बचत होगी। अभी अधिकांश निवेशक ‘रेगुलर प्लान’ चुनते हैं, जिसपर उन्हें अधिक ‘एक्सपेंस रेशियो’ (expense ratio) देना होता है।

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, पांडे ने कहा कि यह कदम निवेशकों की सुरक्षा को मजबूत करने और निवेश की लागत के बारे में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सेबी (SEBI) के प्रयासों का हिस्सा है।

निवेशकों के लिए इस बदलाव का क्या मतलब?

सबसे पहले समझते हैं कि डायरेक्ट और रेगुलर म्यूचुअल फंड प्लान में क्या अंतर है?

एक ही म्यूचुअल फंड स्कीम के डायरेक्ट और रेगुलर प्लान, एक ही पोर्टफोलियो में निवेश करते हैं और इन्हें एक ही फंड मैनेजर मैनेज करता है। इनमें मुख्य अंतर इनके डिस्ट्रीब्यूशन (वितरण) के तरीके और एक्सपेंस रेशियो का होता है।डायरेक्ट प्लान को बिना किसी डिस्ट्रीब्यूटर के खरीदा जाता है, जबकि रेगुलर प्लान को किसी डिस्ट्रीब्यूटर या मध्यस्थ के जरिए खरीदा जाता है। रेगुलर प्लान का एक्सपेंस रेशियो आमतौर पर ज्यादा होता है, क्योंकि इनकी लागत में डिस्ट्रीब्यूटर का कमीशन भी शामिल होता है।

एक्सपेंस रेशियो, किसी म्यूचुअल फंड स्कीम को मैनेज करने और चलाने की सालाना लागत होती है, जिसे स्कीम की कुल संपत्ति (एसेट्स) के प्रतिशत के रूप में दिखाया जाता है। इसे स्कीम की संपत्ति से ही काटा जाता है, जिसका असर निवेशकों को मिलने वाले रिटर्न पर पड़ता है।

कम एक्सपेंस रेशियो से क्या फायदा?

बता दें कि म्यूचुअल फंड की एक ही स्कीम के रेगुलर प्लान की तुलना में डायरेक्ट प्लान का एक्सपेंस रेशियो आमतौर पर कम होता है, इसलिए अगर बाकी सभी चीजें समान रहें, तो डायरेक्ट प्लान में निवेश करने वाले लोग समय के साथ अधिक रिटर्न मिल पाएगा। निवेश की लंबी अवधि में यह अंतर और भी बड़ा हो जाता है, क्योंकि खर्च उस रकम को कम कर देते हैं जो निवेशित रहती है और समय के साथ कंपाउंड होती है।

हालांकि, डायरेक्ट और रेगुलर प्लान में से किसे चुनना है, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि निवेशक को डिस्ट्रीब्यूशन सेवाओं की जरूरत है या निवेश से जुड़े फैसलों में मदद की।

1 नवंबर से क्या बदलेगा?

पांडे की घोषणा के अनुसार, 1 नवंबर से AMC के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ‘डायरेक्ट प्लान’ डिफॉल्ट विकल्प बन जाएंगे। जो निवेशक ‘रेगुलर प्लान’ चुनते हैं, उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि उनका एक्सपेंस रेशियो अधिक होता है। हालांकि, इस घोषणा में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि क्या यह बदलाव थर्ड-पार्टी इन्वेस्टमेंट प्लेटफॉर्म पर भी लागू होगा, या अलग-अलग AMC ऐप्स पर इस डिफॉल्ट विकल्प को किस तरह से दिखाया जाएगा।

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