नई दिल्ली: रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड सप्लायर है। जून तिमाही में भारत के कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी रही। लेकिन अब भारत की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अमेरिकी सीनेट ने एक बिल पारित किया है जो अमेरिकी राष्ट्रपति को उन पांच देशों के सामान पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार देता है जो रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल खरीदते हैं। इनमें चीन, भारत, अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया शामिल हैं। भारत पर इसका असर ज्यादा हो सकता है क्योंकि रूसी तेल पर हमारी निर्भरता काफी बढ़ गई है।
इस बीच ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने कहा है कि भारत को अमेरिका के टैरिफ बढ़ाने की धमकी के आधार पर अपनी एनर्जी पॉलिसी तय नहीं करनी चाहिए। जब तक रूसी कच्चा तेल खरीदना फायदेमंद है, भारत को इसे खरीदते रहना चाहिए। यह बिल अगर यह कानून बन जाता है, तो अमेरिकी राष्ट्रपति को किसी खास देश पर टैरिफ लगाने का काफी अधिकार मिल जाएगा। यह टैरिफ उन देशों पर लागू होगा जो कानून लागू होने के 30 दिन बाद भी रूसी कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदना जारी रखेंगे।
रूस से कच्चे तेल का आयात
GTRI की रिपोर्ट के अनुसार पिछले फाइनेंशियल ईयर में भारत के कुल $134.7 बिलियन के कच्चे तेल के आयात में से रूस की हिस्सेदारी $40.8 बिलियन थी। यानी भारत के कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी 30.3% थी। रिसर्च संस्था ने कहा कि रूस से सस्ते दाम पर मिले कच्चे तेल से भारत को अपना तेल आयात बिल कम करने, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और महंगाई को काबू में रखने में मदद मिली है।
इस थिंक टैंक के फाउंडर अजय श्रीवास्तव ने कहा, “भारत को टैरिफ की धमकियों के आधार पर अपनी ऊर्जा नीति तय नहीं करनी चाहिए। जब तक रूसी कच्चा तेल कमर्शियल तौर पर फायदेमंद है, भारत को इसे खरीदना जारी रखना चाहिए। इसके साथ ही अमेरिका के साथ मतभेदों को मजबूती से बातचीत करके सुलझाना चाहिए। हमें एकतरफा रियायतें नहीं देनी चाहिए। इससे भारत की ऊर्जा लागत बढ़ेगी और उसकी रणनीतिक आजादी कमजोर होगी।”










































