पद्मेश न्यूज। लालबर्रा। नगर मुख्यालय के बालाघाट रोड़ स्थित लॉन में सर्व ब्राम्हण संत पुजारी संगठन लालबर्रा के तत्वाधान में भगवान परशुराम जन्मोत्सव के पावन अवसर पर २० अप्रैल को यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार कार्यक्रम संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम महंत इन्द्रपाल त्यागी जी महंत, आचार्य जर्नादनभाई द्विवेदी सर्व ब्राम्हण संत पुजारी संगठन ब्लाक अध्यक्ष घनश्याम शुक्ला एवं सर्व ब्राम्हण संत पुजारी संघ लालबर्रा के पदाधिकारियों की उपस्थिति में प्रारंभ हुआ। जिसमें सर्वप्रथम उपस्थितजनों ने भगवान परशुराम के छायाचित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर माल्यार्पण किया। इस अवसर पर बालाघाट से पधारे आचार्य जनार्धन द्विवेदी के द्वारा १४ ब्राम्हण समाज के बालकों का यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न करवाया गया। साथ ही दिनभर विविध धार्मिक कार्यक्रम संपन्न हुए एवं शाम में शोभायात्रा निकाली गई। आपकों बता दे कि ब्राम्हण समाज में यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार एक महत्वपूर्ण संस्कार है, यह संस्कार होने के बाद ही ब्राम्हण समाज के बालक गुरूकुल, विद्यापीठ के अंदर शिक्षा ग्रहण करने, कथा, हवन-पूजन, यज्ञ करने के योग्य हो जाते है और यज्ञोपवीत संस्कार करने के बाद ही विवाह कर सकते है इसलिए बालकों को शादी के पहले यह संस्कार करवाना पड़ता है। इस संस्कार में शादी के दौरान जो रीति-रिवाज संपन्न होता है उसका पूरा निर्वहन किया जाता है सिर्फ बालक की बारात नही निकलती है। २० अप्रैल को आयोजित कार्यक्रम में बालाघाट, लांजी एवं सिवनी, महाराष्ट्र जिले के १४ ब्राम्हण समाज के बालकों का यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न हुआ। वहीं मंचीय कार्यक्रम में उपस्थित पदाधिकारियों ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यज्ञोपवीत संस्कार के महत्व के बारे में जानकारी देकर सभी को संगठित होकर समाजोत्थान के क्षेत्र में काम करने की बात कही। आयोजन समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि ब्राम्हणों के बालकों का यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता है और हमारे समाज में ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन वर्णों को द्विज कहा जाता है। जिस तरह से दांतों के जन्म दो बार होता है, इस तरह से ब्राम्हणों का जन्म भी दो बार होता है, एक बार माँ की कोख से और दूसरी बार यज्ञ से ब्राम्हण का जन्म होता है। साथ ही यह भी बताया कि हमारे शास्त्रों में उल्लेख है कि ब्राम्हणों के बालकों का जनेऊ संस्कार होना जरूरी है और हमारे सनातन धर्म के १६ संस्कारों में से यह एक संस्कार है। जिसे जन्म संस्कार भी कहा जाता है और ब्राम्हण समाज के बालक है, जिनका जब तक यज्ञोपवीत संस्कार न हो वह ब्राम्हण नही कहलाते है इसलिए उनका यज्ञोपवीत संस्कार विवाह के पूर्व करवाना जरूरी है।










































