सावन मास की शुक्ल पक्ष की आने वाली एकादशी को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस एकादशी को पवित्रा एकादशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। साथ ही इस व्रत को करने वालों को अनजाने में किए गए पापों से भी मुक्ति मिलती है। विस्तार से पढ़ें पुत्रदा एकादशी व्रत की संपूर्ण कथा।
युधिष्ठिर ने पूछा- हे भगवन। सावन के शुक्ल पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? कृपया मेरे सामने उसका वर्णन कीजिए।युधिष्ठिर ने भगवान से पूछा कि हे मधुसूदन। सावन के शुक्ल पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? कृपया करके मुझे इसका वर्णन कीजिए।
युधिष्ठिर की बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण बोले- हे युधिष्ठिर प्राचीन काल की बात है, द्वापर युग के एकदम आरंभ का समय था, माहिष्मती पुर में राजा महीजित अपने राज्य का पालन करते थे, लेकिन, उन्हें एक ही दुख था कि उनके कोई पुत्र नहीं था। इसलिए वह राज्य उन्हें सुखदायक नहीं प्रतीत होता था। अपनी अवस्था अधिक देख राजा को बड़ी चिंता हुई। उन्होंने प्रजा वर्ग में बैठकर इस प्रकार कहा- ‘प्रजाजनो! इस जन्म में मुझसे कोई पातक नहीं हुआ। मैंने अपने खजाने में अन्याय से कमाया हुआ धन नहीं जमा किया है। ब्राह्मणों और देवताओं का धन भी मैंने कभी नहीं लिया है। प्रजा का पुत्रवत पालन किया, धर्म से पृथ्वी पर अधिकार जमाया तथा दुष्टों को, वे बन्धु और पुत्रों के समान ही क्यों न रहे हों, दण्ड दिया है। शिष्ट पुरुषों का सदा सम्मान किया और किसी को द्वेष का पात्र नहीं समझा। फिर क्या कारण है, जो मेरे घर में आज तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ। आप लोग इसका विचार करें।’













































