Mansour Abbas Ra am Joint List Govt Formation: इजरायल के संसदीय चुनावों में अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों ने रिकॉर्ड 19 सीटें जीतकर किंगमेकर की भूमिका हासिल कर ली है। जानिए सरकार गठन की इस राजनीतिक खींचतान के मुख्य बिंदु।Israel Election Results 2026: इजरायली आम चुनावों के नतीजों में कोई स्पष्ट विजेता नहीं निकला है। इससे एक बार फिर यह सामने आया है कि कैसे एक गहरे बंटे हुए समाज में लोकतंत्र काम करता है। इजरायली समाज के हर वर्ग ने अपने प्रतिनिधियों को वोट दिया, जिसका नतीजा एक खंडित जनादेश के रूप में सामने आया।
हालांकि बेंजामिन नेतन्याहू की ‘लिकुड’ पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन को सबसे ज्यादा सीटें (53) मिलीं, लेकिन सरकार बनाने के लिए यह काफी नहीं है। वहीं, गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले (यशार) विपक्ष को 48 सीटें मिलीं- भले ही बदलाव के लिए वोट देने के लिए उनके हजारों समर्थक विदेश से उड़कर इजरायल पहुंचे थे। सबसे चौंकाने वाली बात अरब पार्टियों के प्रदर्शन को लेकर रही, जिन्हें 120 सदस्यों वाली ‘नेसेट’ (इजरायली संसद) में उम्मीद से कहीं ज्यादा वोट और सीटें (19) मिलीं।
सरकार बनाने का गणित सीधा सा लगता है: दो प्रमुख यहूदी राजनीतिक गुटों में से कोई भी, बहुमत जुटाने के लिए अरब पार्टियों- जैसे ‘यूनाइटेड अरब लिस्ट’ (राआम) या ‘हदाश-ताअल’ गठबंधन का समर्थन ले सकता है। लेकिन, ऐसा लगता है कि कोई भी पक्ष ऐसा करने को तैयार नहीं है।यह समझने के लिए कि दक्षिणपंथी और मध्य-वामपंथी, दोनों ही पक्ष इस तरह की गहरी हिचकिचाहट क्यों दिखाते हैं, हमें यह देखना होगा कि इजरायल अपने लोकतांत्रिक संस्थानों और एक ‘यहूदी राज्य’ के रूप में अपनी पहचान के बीच कैसे संतुलन बनाता है। Indian Express की एक रिपोर्ट में इस मुद्दे का विश्लेषण करने के लिए, इतिहासकार एलन डाउटी के हवाले से बताया कि लोकतंत्र की प्रकृति कैसी है और कैसे इजरायल ने लंबे समय से इसे बनाए रखा है।
एक अलग तरह का लोकतंत्र
डच-अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक एरेन्ड लिजफार्ट के ‘कॉन्सोसिएशनल डेमोक्रेसी’ (सहयोगात्मक लोकतंत्र) के सिद्धांत को नोट करते हुए, डाउटी इजरायल को कई पैमानों पर ‘आम सहमति पर आधारित व्यवस्था’ में रखते हैं, साथ ही वे इसके ‘बहुसंख्यकवादी’ लक्षणों को भी स्वीकार करते हैं। ‘कॉन्सोसिएशनल’ सिद्धांत बताता है कि गहरे बंटे हुए समाजों में एक स्थिर लोकतंत्र सत्ता-साझाकरण, बड़े गठबंधनों, आपसी वीटो अधिकारों और आनुपातिक प्रतिनिधित्व पर निर्भर करता है।
हालांकि, इजरायल के संदर्भ में, ये ‘सहयोगात्मक’ विशेषताएं ऐतिहासिक रूप से केवल यहूदी समाज की राजनीति तक ही सीमित रही हैं, जिसमें धर्मनिरपेक्ष, धार्मिक, अशकेनाजी और सेफार्डिक गुटों के बीच वैचारिक मतभेदों को समायोजित किया जाता है।
इजरायली अरबों को नागरिकता के औपचारिक अधिकार प्राप्त हैं, जिसमें वोट देने का अधिकार और राजनीतिक व्यवस्था तक पहुंच शामिल है, लेकिन ज्यादातर मौकों पर उन्हें पारंपरिक यहूदी राजनीति के दायरे से बाहर ही रखा गया है। कई क्षेत्रों में प्रगति के बावजूद, अरबों को अपनी पहली स्वतंत्र संसदीय पार्टी- ‘अरब डेमोक्रेटिक पार्टी’ (माडा, 1988)- बनाने में 40 साल लग गए।
इस संस्थागत बहिष्कार का सारांश देते हुए, रिपोर्ट में राजनीतिक वैज्ञानिक इयान लस्टिक बताते हैं कि इजरायल में ‘कॉन्सोसिएशनल’ (सहयोगात्मक) प्रणालियों की तरह, उच्च-स्तरीय सौदेबाजी की प्रक्रियाओं में कोई पारंपरिक अरब वार्ताकार मौजूद नहीं है। लस्टिक का तर्क है कि, भले ही अरब आबादी का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा हैं, फिर भी यहूदी और अरब राजनीतिक अभिजात वर्ग के बीच कोई व्यवस्थित जातीय सौदेबाजी या संसाधनों का आनुपातिक बंटवारा नहीं होता, जैसा कि आम तौर पर पारंपरिक आम सहमति वाले लोकतंत्रों में देखा जाता है।
इजरायली राजनीति को ‘बहुसंख्यकवाद’ और ‘सहयोगात्मक लोकतंत्र’ (कॉन्सोसिएशनलवाद) के अलावा एक और नजरिए से भी देखा जा सकता है। इजरायली समाजशास्त्री सैमी स्मूहा का सुझाव है कि इजरायल ‘जातीय लोकतंत्र’ (एथनिक डेमोक्रेसी) की श्रेणी में आता है, जहां एक प्रमुख जातीय चरित्र के साथ-साथ सभी को लोकतांत्रिक अधिकार भी प्राप्त होते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार, इजरायल जिस तरह से अपने सार्वजनिक दायरे और राष्ट्रीय हितों को परिभाषित करता है, वह केवल यहूदी बहुसंख्यकों की इच्छाओं को दर्शाता है, जबकि राष्ट्रीय मामलों में अरब अल्पसंख्यकों की भागीदारी को कमजोर करता है।
इसके अलावा, 2018 के ‘बेसिक लॉ’ (मूल कानून) जैसे कानून, यहूदी आत्मनिर्णय के अधिकार को कानूनी प्राथमिकता देकर इस स्थिति को और अधिक औपचारिक बना देते हैं। यह कानून स्पष्ट करता है कि इजरायल राज्य में राष्ट्रीय आत्मनिर्णय का अधिकार केवल यहूदी लोगों के पास है। अरब राजनेताओं, नागरिक अधिकार संगठनों और गैर-यहूदी समुदायों (जिनमें ड्रूज समुदाय भी शामिल है) ने इस कानून की आलोचना की है, क्योंकि इसमें नागरिक समानता की कोई स्पष्ट गारंटी नहीं दी गई है। आलोचकों का तर्क है कि इसने एक तरह से संरचनात्मक पदानुक्रम को कानूनी रूप दे दिया है, जो सीधे तौर पर स्मूहा के ‘जातीय लोकतंत्र’ के मॉडल से मेल खाता है।
जुलाई 2021 में, इजरायल के सुप्रीम कोर्ट ने 10-1 के फैसले से इस कानून को बरकरार रखा। कोर्ट ने माना कि हालांकि ‘बेसिक लॉ’ इजरायल की राष्ट्रीय पहचान को एक ‘यहूदी राज्य’ के रूप में स्थापित करता है, लेकिन यह अन्य ‘बेसिक लॉ’ के तहत मिलने वाले व्यक्तिगत मानवाधिकारों को खत्म नहीं करता है।
इनसाइडर-आउटसाइडर
जहां नेतन्याहू ने अरब गुट को एक आंतरिक खतरे के रूप में पेश किया है, वहीं विपक्षी नेताओं ने भी चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि वे इन पार्टियों से दूर रहेंगे।
इसका एक मुख्य कारण इजरायल-फिलिस्तीन के बीच चल रहा संघर्ष है। जायोनी पार्टियां इजरायली अरब नागरिकों पर इजरायल के बाहर के लोगों (फिलिस्तीनियों) के प्रति वफादार होने का आरोप लगाती हैं। स्मूहा के अनुसार, अधिकांश यहूदी नेताओं की नजर में इज़राइली अरब एक ‘दुश्मन से जुड़े अल्पसंख्यक’ की जटिल स्थिति में हैं। वे भूगोल, इतिहास और नाते-रिश्ते के जरिए वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी के फिलिस्तीनियों से जुड़े हैं, जबकि साथ ही इजरायल की राजनीतिक नागरिकता भी रखते हैं।
गाजा पर चल रहे हमलों के बीच, इजरायल की ज्यादातर पार्टियां अरब पार्टियों पर निर्भर रहने को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा मानती हैं। इसके विपरीत, अरब पार्टियां इजरायल को केवल एक ‘यहूदी राज्य’ मानने वाली जायोनी परिभाषा को खारिज करती हैं। इसके बजाय, वे इजरायल में अपने पूर्ण अधिकारों और प्रतिनिधित्व की वकालत करती हैं। साथ ही, वे 1967 की सीमाओं के आधार पर एक फिलिस्तीनी राज्य का समर्थन करती हैं-एक ऐसा रुख जिसका समर्थन कई यहूदी नागरिक भी करते हैं। जब सैन्य कार्रवाई तेज हो जाती है, तो अरब सांसदों पर अपने निर्वाचन क्षेत्रों से भारी दबाव होता है कि वे IDF (इजरायली सेना) की कार्रवाइयों की निंदा करें।
वोटों की गिनती के बाद, यह मांग जोर पकड़ने लगी है कि नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए विपक्षी गुट को अरब पार्टियों के साथ हाथ मिला लेना चाहिए। हालांकि, ‘हदाश-ताअल’ (Hadash-Ta’al) जैसे गुटों के साथ सीधे गठबंधन करने से दक्षिणपंथी सहयोगी दल (जैसे ‘यिसरायल बेतेनु’ या ‘यामिना’ के उत्तराधिकारी) नाराज हो सकते हैं। संसद में 61 सीटों का बहुमत हासिल करने के लिए इन दलों के वोट भी उतने ही जरूरी हैं।
हाल ही में ऐसा एक उदाहरण देखने को मिला था। 2021 में, नफ्ताली बेनेट और यायर लापिड के नेतृत्व में इज़राइल की 36वीं सरकार बनी थी। इसे मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली ‘राअम’ (Ra’am) पार्टी का समर्थन हासिल था, जिसने केवल चार सीटें जीती थीं। अब्बास और उनकी पार्टी के सदस्यों ने राजनीतिक संप्रभुता की व्यापक बहसों के बजाय अरब कस्बों में नागरिक अधिकारों, आवास, अपराध की रोकथाम और आर्थिक विकास को प्राथमिकता दी। हालांकि, 2022 में वैचारिक मुद्दों- जिसमें कब्जे वाले वेस्ट बैंक में अवैध बस्तियां भी शामिल थीं, तो इसके कारण यह सरकार गिर गई।
सीमाओं के पार प्रभाव
अरब पार्टियों द्वारा जीती गई 19 सीटें यह दिखाती हैं कि अरब नागरिकों ने इजरायली लोकतंत्र को अपना लिया है और वे मतदान के अधिकार से आगे बढ़कर अपनी राजनीतिक भागीदारी को और बढ़ाना चाहते हैं। अगर जायोनी पार्टियां अभी भी उनसे दूरी बनाए रखती हैं, तो इसका असर इजरायल की उन कोशिशों पर पड़ सकता है, जिनके जरिए वह डोनाल्ड ट्रंप समर्थित ‘अब्राहम समझौते’ के माध्यम से पड़ोसी अरब और मुस्लिम देशों के साथ अपने संबंधों को सामान्य बनाना चाहता है।







































