आलोट/रतलाम। दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग पर रविवार तड़के जब तिरुवनंतपुरम-हजरत निजामुद्दीन राजधानी एक्सप्रेस के यात्री गहरी नींद में सो रहे थे, तब मौत उनके बेहद करीब पहुंच चुकी थी। सरकारी दावों के उलट, चश्मदीद यात्रियों का कहना है कि बोगी में न तो कोई सायरन बजा और न ही रेलवे का अत्याधुनिक अलार्म सिस्टम काम आया।
अगर समय रहते एक सजग सह-यात्री देवदूत बनकर चीख-पुकार नहीं मचाता, तो शायद देश एक बड़े और खौफनाक नरसंहार का गवाह बन जाता। कोच से बाहर निकलने के दौरान कई यात्री घायल भी हुए, जिन्हें उपचार के लिए अस्पताल भेजा गया। ग्रामीणों ने भी राहत कार्य में मदद की और यात्रियों को सुरक्षित स्थान पर ठहराया। गुजरात के सूरत निवासी यात्री ने कांपती आवाज में मौत के उस मंजर को बयां किया।
उन्होंने बताया मैं बोगी (बी-1) में जनरेटर के पास वाली सीट संख्या 4 और 5 पर बैठा हुआ था। सुबह करीब 5 बजे अचानक जनरेटर की तरफ से एक भयानक आवाज आई। जब मैंने खिड़की के कांच से बाहर देखा, तो वहां एक बड़ा आग का गोला धधक रहा था। पूरा डिब्बा गहरी नींद में था। मुझे समझ आ गया कि अगर मैंने बोगी का मुख्य दरवाजा खोला, तो बाहर की लपटें तुरंत अंदर आ जाएगी।
मैंने दरवाजा खोलने की बजाय पूरी ताकत से चिल्लाना शुरू किया— ‘भागो, जागो, सब सामान छोड़ो व आगे के दरवाजे से बाहर निकलो!’ अगर मैं उस वक्त सोया होता या चिल्लाने में थोड़ी भी देर करता, तो बोगी के कम से कम 50 प्रतिशत यात्री जिंदा जल जाते।
परिवार संग घूमने गए थे, सामान राख हुआ
हरियाणा के रोहतक की रहने वाली महिला यात्री ने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि मेरा पूरा परिवार गोवा घूमकर लौट रहे थे। सुबह 5 बजे जब मेरी आंख खुली, तो गाड़ी में कोई अलार्म नहीं बज रहा था।
तभी एक भैया ने चिल्लाकर हमें जगाया और हम जैसे थे वैसे ही बाहर भागे। बच्चों के सारे कपड़े, गोवा से की गई हजारों की शापिंग और बैग में रखे करीब 40-50 हजार रुपये सब कुछ हमारी आंखों के सामने जलकर स्वाहा हो गया।
एफएसएल ने की जांच कोच के व्हील भी देखे
हादसे के बाद रेलवे की एफएसएल टीम भी मौके पर पहुंची और जांच शुरू की। रेल अधिकारियों ने आग बुझने के बाद रेल अधिकारियों ने कोच के अंदर भी निरीक्षण किया। हाट एक्सेल से आग लगने की आशंका को लेकर कोच के व्हील की भी जांच की गई। इधर रेलवे की सीएंडडब्लयू राहत वैन के शामगढ़-सुवासरा के मध्य दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद सारा सामान सड़क पर बिखर गया, इसके चलते मौके पर राहत भी देरी से पहुंचाई जा सकी।
धूप में तड़पते रहे बच्चे, दो घंटे बाद मिला पानी
महाराष्ट्र के रत्नागिरी से राजधानी में सवार हुए एक युवक ने बताया कि चीख-पुकार सुनते ही डिब्बे में ऐसी भगदड़ मची कि लोग जान बचाने के लिए एक-दूसरे के ऊपर गिरने लगे। धुआं इतना घना था कि दम घुटने लगा था। युवक ने रोते हुए कहा, मेरी आंखों के सामने मेरे चार बैग, नकदी, मोबाइल और लैपटाप सब जल गए।
सामान उठाने तक का मौका नहीं मिला। रेलवे की व्यवस्थाओं का आलम यह था कि हादसे के बाद छोटे-छोटे बच्चे घंटों तक इस कड़कती धूप में बिना पानी के प्यासे तड़पते रहे। हमें दो घंटे बाद पीने के लिए पानी नसीब हुआ।










































